रऊफ अहमद सिददीकी की दुनिया में आपका स्वागत है

Tuesday, July 2, 2019

गर्म गोश्त का धंधा नोयडा में चर्म पर

देश के चुनिंदा शहरों की अगर बात करें नोएडा का नाम सबसे पहले लिया जाता नोएडा मे हर इंसान आने की हसरत रखता है और कम समय में नोएडा में ज्यादा पैसा बटोरने की भी लोगों के अंदर मानसिकता होती है लेकिन पैसा कमाने के लिए कुछ लोग इंसानियत को कितना शर्मसार कर देते हैं एक ऐसा ही मामला प्रकाश में आया

नोएडा के सेक्टर 18 में 2 दिन पूर्व गौतम बुध नगर पुलिस द्वारा छापेमारी की गई जिसमें दर्जनों स्पा पार्लर पर पुलिस ने रेड मारी इस छापेमारी के लिए गौतम बुध नगर के एसएसपी वैभव कृष्ण द्वारा 15 टीमों को गठित किया गया जिसके तहत नोएडा के सेक्टर 18 में पुलिस को बड़ी सफलता हासिल हुई

पुलिस ने एक स्पा पार्लर से आपत्तिजनक हालत में युवक व युवतियों को पकड़ा है छापेमारी के दौरान स्पा पार्लर के अंदर से बीयर की बोतलें वह कुछ आपत्तिजनक वस्तुएं भी बरामद की है फिलहाल पकड़े गए युवक व युवतियों को पुलिस ने सलाखों के पीछे डाल दिया है जिस तरीके से गौतम बुध नगर जिले के एसएसपी वैभव किसने इस बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया उससे पुलिस विभाग के अलावा जिले के नागरिकों ने भी उनकी सराहना की।
लेकिन सवाल यह है किस जिले में दिल दहला देने वाला रैकेट अवैध तरीके से चलाया जा रहा है और पुलिस को इसका खबर नहीं
क्या पुलिस सब कुछ जानते हुए इस तरीके के कारनामे को नजरअंदाज कर रही है या फिर पुलिस इतनी कमजोर है किस शहर को इस तरीके से गंदा करने वाले लोगों से मुकाबला नहीं कर सकती यह तमाम सवाल ले शहर के नागरिक इन दिनों बेसब्री से उस पल का इंतजार कर रहे हैं जब शहर से पुलिस निडर होकर यह गंदगी साफ करेगी फिलहाल इस पूरे महकमे में कई पुलिस अधिकारी भी जांच के घेरे में हैं

Thursday, May 16, 2019

तालीम के लिए ये ज़रूरी है

अगर हम अपने दूसरे अल्पसंख्यक भाई जैसे सरदार, जैन और ईसाईयो की तरफ़ देखें तो पाएंगे की उन्होंने अपने हर तरफ़ स्कूल और कॉलेज खोल रखे हैं ।

फिर क्या वजह है मुसलमानो के इलाक़ों में ना तो अपने अच्छे स्कूल हैं और ना कॉलेज और ना अस्पताल।

*सवाल 1: मुसलमानो के पास ज़मीन नही जिससे स्कूल कॉलेज और अस्पताल खोले जा सकें ।*

उत्तर : पूरे भारत में रेलवे और DRDO के बाद वक़्फ़ के पास सबसे ज़्यादा ज़मीन है । लेकिन उसी वक़्फ़ की ज़मीन को हमारे मुसलमान नेता कोड़ियों के भाव बेचकर खा रहे हैं ।

*सवाल 2: मुसलमानो के पास पैसे नहीं हैं स्कूल खोलने के लिए ।*

जवाब : पूरे भारत में एक साल में क़रीब 40 हज़ार करोड़ ज़कात इकट्ठी होती है क्या आप हिसाब मांगते हैं जिसको अपनी ज़कात देतें हैं कि उसने कहा ख़र्च की ? सोचिये अगर एक ज़िले में उसका एक हज़ार करोड़ भी ख़र्च हो जाए तो कितने मदरसे,अस्पताल और स्कूल खुल जाएंगे ।

*सवाल 3: जब वक़्फ़ बोर्ड के पास इतनी ज़मीन है तो वक़्फ़ बोर्ड अस्पताल या स्कूल क्यों नही खोलता जिस इलाक़े में मुसलमान पिछड़े हुए हैं ?*

जवाब : जिस तरह हरयाणा वक़्फ़ बोर्ड ने Mewat Engineering College खोला और उसको ख़ुद चला रहा है ठीक उसी तरह बाक़ी राज्यों के वक़्फ़ बोर्ड मुस्लिम इलाक़ों में स्कूल कॉलेज खोलकर उनको ख़ुद चला सकते हैं मगर ऐसा नही हो रहा।उनको अपने वजूद का ख़तरा महसूस होता है।

इसके लिए सरकार या अपने नेताओं के भरोसे बैठने की बजाए हम लोगों को ख़ुद पहल करनी होगी। अगर हम लोगो ने अपने तालीमी इदारे क़ायम नही किये तो हमारी आने वाली पीढ़ियां मज़दूरी करेंगी।

रउफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज

Tuesday, May 7, 2019

ज़कात क्या है और किसे देनी है

बराय मेहरबानी पूरा पढ़े।
क्या *जकात,फितरा,इमदाद, खैरात* हर उस मुसलमान को दी जाए? जो फर्जी मदरसों और मस्जिदों के सफीर बनकर मुसलमानों के पास आते हैं और लाखों रुपये बतौर चन्दा इक्कठा करने के बाद कभी उन लोगों को हिसाब किताब नहीं देते, जो अपनी खुन पसीने की कमाई में से कुछ रुपया अपना फर्ज समझकर फितरा, जकात, इमदाद, खैरात के रुप में  इस उम्मीद के साथ देते हैं कि उनकी नेक कमाई जरुरतमंद लोगों के पास जा रही है।
दोस्तों, थोड़ा अन्दाजा लगाईये। हकूमत के मुताबिक मुसलमान मुल्क में 25 करोड़ हैं और गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 करोड़ से भी ज्यादा। यदि मान लिया जाए कि एक मुसलमान एक साल में 100 रुपये फितरा, जकात, इमदाद, खैरात के रुप में ऐसे लोगों को देता है। तो ये लोग मुल्क के मुसलमानों से 2500-3000  करोड़ रुपये हर साल चंदे के रुप में उगाही करते है और विदेशों से चंदे की उगाही रही अलग और इनके ठाठ बाट जग जाहिर है
फिर आप खुद ही अन्दाजा लगा सकते हैं कि इतनी भारी रकम को यदि एक सिस्टम के तहत इकठ्ठा किया जाए और उससे जरुरतमंद लोगों के लिए, स्कूल, अस्पताल और कॉलेज वगैरा कायम किये जाए, तो उससे कौम और वतन को कितना फायदा हो सकता है। मगर मुसलमान है कि बिना सोचे समझे जो भी मुसलमान चंदे की गरज से कापी लेकर उनके दर पर आ जाता है, उससे सवाब समझकर अपनी नेक कमाई का हिस्सा, ये जाने बिना थमा देता है कि उसका सही इस्तेमाल हो भी रहा है या नहीं।

*ज़कात_क्या_है ?*
#और_किसको_देनी_चाहिये ?
ज़कात क्या है ? और किसको देनी चाहिये ?
रमज़ान के अशरे में सब मुसलमान अपनी साल भर की कमाई की ज़कात निकालते है। तो ज़कात क्या है ?

*कुरआन मजीद में अल्लाह ने फ़र्माया है :
“ज़कात तुम्हारी कमाई में गरीबों और मिस्कीनों का हक है।”
और ज़कात किसे देनी चाहिए इसपर हम इस पोस्ट में मुख़्तसर सा बयांन करने की कोशिश कर रहे है.

✦ ज़कात क्या है ?
अल्लाह के लिये माल का एक हिस्सा जो शरियत ने तय किया उसका मुसलमान फकीर (जरूरतमंद) को मालिक बना देना शरीयत में ज़कात कहलाता है’
✦ ज़कात किसको दी जाये ?
ज़कात निकालने के बाद सबसे बडा जो मसला आता है वो है कि ज़कात किसको दी जाये ?
ज़कात देते वक्त इस चीज़ का ख्याल रखें की ज़कात उसको ही मिलनी चाहिये जिसको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो…वो शख्स जिसकी आमदनी कम हो और उसका खर्चा ज़्यादा हो। अल्लाह ने इसके लिये कुछ पैमाने और औहदे तय किये है जिसके हिसाब से आपको अपनी ज़कात देनी चाहिये। इनके अलावा और जगहें भी बतायी गयी है जहां आप ज़कात के पैसे का इस्तेमाल कर सकते हैं।

१. सबसे पहले ज़कात का हकदार है : “फ़कीर”:
फ़कीर कौन है? – फ़कीर वो शख्स है मानो जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 21,000/- रुपये सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से भी कम है तो इस शख्स की आप ज़कात 11,000/- रुपये से मदद कर सकते है।

२. दुसरा नंबर आता है “मिस्कीन” का:
“मिस्कीन” कौन है? मिस्कीन वो शख्स है जो फ़कीर से थोडा अमीर है। ये वो शख्स है मानो जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 15,000/- सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से ज़्यादा है तो आप इस शख्स की आप ज़कात के 5,000/- रुपये से उसकी मदद कर सकते है।

३. तीसरा नंबर आता है “तारिके कल्ब” का:
“तारिके कल्ब” कौन है? “तारिके कल्ब” उन लोगों को कहते है जो ज़कात की वसुली करते है और उसको बांटते है। ये लोग आमतौर पर उन देशों में होते है जहां इस्लामिक हुकुमत या कानुन लागु होता है। हिन्दुस्तानं में भी ऐसे तारिके कल्ब है जो मदरसों और स्कु्लों वगैरह के लिये ज़कात इकट्ठा करते है। इन लोगो की तनख्खाह ज़कात के जमा किये गये पैसे से दी जा सकती है।

४. चौथे नंबर आता है “गर्दन को छुडानें में”:
पहले के वक्त में गुलाम और बांदिया रखी जाती थी जो बहुत बडा गुनाह था। अल्लाह की नज़र में हर इंसान का दर्ज़ा बराबर है इसलिये मुसलमानों को हुक्म दिया गया की अपनी ज़कात का इस्तेमाल ऎसे गुलामो छुडाने में करो। उनको खरीदों और उनको आज़ाद कर दों। आज के दौर में गुलाम तो नही होते लेकिन आप लोग अब भी इस काम को अंजाम दे सकते है।

अगर कोई मुसलमान पर किसी ऐसे इंसान का कर्ज़ है जो जिस्मानी और दिमागी तौर पर काफ़ी परेशान करता है, या जेलों में जो बेकसूर और मासूम मुसलमान बाज़ शर्रपसंदों के फितनो के सबब फंसे हुए है आप ऐसे मुसलमानो की भी ज़कात के पैसे से मदद कर सकते है और उनकी गर्दन को उनपर होने वाले जुल्मो से छुडा सकते हैं।

५. पांचवा नंबर आता है “कर्ज़दारों” का:
आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल मुसलमानों के कर्ज़ चुकाने में भी कर सकते है। जैसे कोई मुसलमान कर्ज़दार है वो उस कर्ज़ को चुकाने की हालत में नही है तो आप उसको कर्ज़ चुकाने के लिये ज़कात का पैसा दे सकते है और अगर आपको लगता है की ये इंसान आपसे पैसा लेने के बाद अपना कर्ज़ नही चुकायेगा बल्कि उस पैसे को अपने ऊपर इस्तेमाल कर लेगा तो आप उस इंसान के पास जायें जिससे उसने कर्ज़ लिया है और खुद अपने हाथ से कर्ज़ की रकम की अदायगी करें।

६. छ्ठां नंबर आता है “अल्लाह की राह में”:
“अल्लाह की राह” का नाम आते ही लोग उसे “जिहाद” से जोड लेते है। यहां अल्लाह की राह से मुराद (मतलब) सिर्फ़ जिहाद से नही है। अल्लाह की राह में “जिहाद” के अलावा भी बहुत सी चीज़ें है जैसे : बहुत-सी ऐसी जगहें है जहां के मुसलमान शिर्क और बिदआत में मसरुफ़ है और कुरआन, हदीस के इल्म से दुर है तो ऐसी जगह आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है।
अगर आप किसी ऐसे बच्चे को जानते है जो पढना चाहता है लेकिन पैसे की कमी की वजह से नही पढ सकता, और आपको लगता है की ये बच्चा सोसाईटी और मुआशरे के लिये फ़ायदेमंद साबित होगा तो आप उस बच्चे की पढाई और परवरिश ज़कात के पैसे से कर सकते है।

7. और आखिर में “मुसाफ़िर की मदद”:
मान लीजिये आपके पास काफ़ी पैसा है और आप कहीं सफ़र पर जाते है लेकिन अपने शहर से बाहर जाने के बाद आपकी जेब कट जाती है और आपके पास इतने पैसे भी नही हों के आप अपने घर लौट सकें तो एक मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है की वो आपकी मदद अपने ज़कात के पैसे से करे और अपने घर तक आने का किराया वगैरह दें।

ये सारे वो जाइज़ तरीके है जिस तरह से आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है। अल्लाह आप सभी को अपनी कमाई से ज़कात निकालकर उसको पाक करने की तौफ़ीक दें ! और अल्लाह तआला हम सबको कुरआन और हदीस को पढकर, सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।
आमीन ..

रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज

Tuesday, March 26, 2019

किस पंचायत की बात कर रहे हो

गुरुग्राम की गुंडागर्दी पर जब बीबीसी की टीम ग्राउंड रिपोर्ट के लिए भोंडसी पहुंची तो एक बुज़ुर्ग ने कहा कि हम मुसलमानों को यहां रहने नही देंगे, यदि वह माफ़ी मांगेंगे तो उनको यहां रहने की इजाज़त दी जायेगी और गर उन्होंने माफ़ी नही मांगी तो 2,4 दिन में गांव में पंचायत होगी और पंचायत उनका बहिष्कार कर हुक्का पानी बंद करेगी क्योंकि मुसलमानो के घर में हथियारों का ज़खीरा रहता है,अब कोई इस गुंडे बुज़ुर्ग से कहे कि यदि साजिद के घर मे हथियार होते तो वो तथाकथित 25-30 गुंडे मवाली, आतंकी साज़िद के घर पर हमला नही करते साजिद के बच्चों के साथ मारपीट नही करते साजिद के परिवार की औरतों के साथ बर्बरता की सारी हदें पार ना करते, साजिद व दिलशाद समेत परिवार के मर्दो की गर्दन, टांग, हाथ, पसलियां नही तोड़ते, उनके घर पर तांडव नही मचाते और यदि यह सब भी कर देते रो तो साजिद के पास हथियार होने पर यह तथाकथित लाश बनकर वहां से दूसरों के कंधों पर जाते ये बात अलग कि बीजेपी का केंद्रीय मंत्री भले ही उनकी लाश पर तिरंगा लपेटने चला जाता लेकिन लाश ज़रूर बन सकते थे क्योंकि आदमी अपने साथ हो रही दरिंदगी, बर्बरता को सहन कर सकता है लेकिन उसके घर की महिलाओं के साथ उसकी आँखों के सामने बर्बरता की सारी हदें पार होती रही और साजिद व अन्य मर्द ख़ुद भी बर्बरता सहन करते रहे क्योंकि उनके पास हथियार नही था, और हथियार अख़लाक़ के परिजनों के पास भी नही था, हथियार अफराज़ूल, पहलू, जुनैद, मज़लूम, ज़ुबैर, रकबर के पास भी नही था।
अब सवाल यह उठता है कि यह बुजुर्ग किस पंचायत की बात कर रहा है, शायद उसी पंचायत की जब गुड़गांव में 12 साल की बच्ची के साथ रेप के बाद हत्या हो जाती है और वह पंचायत सरकार का हुक्का पानी बंद करने की धमकी नही देती?शायद उसी पंचायत की जो एक युवक गिरगिट को मार देता है तो उस युवक का हुक्का पानी बंद कर समाज से बहिष्कार कर गांव से भगा दिया जाता है?शायद यह बुजुर्ग उसी पंचायत की बात कर रहा है जो परिवार में बेटा ना होने की वजह से एक आदमी अपनी चारों बेटियों को वचन देता है कि बेटियों मेरी अर्थी को तुम ही शमशान तक ले जाना और पिता की मृत्यु के बाद बेटियां पिता को दिए हुए वचन को निभाने के लिए अर्थी को कांधा देती है तो पंचायत उन बेटियों का भी हुक्का पानी बंद कर समाज से बहिष्कार का ऐलान कर देती है?
आख़िर इस पंचायत को पंचायत लगाने का हक़ दिया किसने है?यह पंचायत बेटियों के साथ हो रही रेप की घटनाओं के बाद किस बिल में बड़ जाती है उस बिल का पता लगाना जरूरी है ताकि ऐसी घटनाओं पर इस पंचायत को खींच कर हर उस घटना पर लगाम लगाने के लिए रगड़ा जा सके।।

रउफ अहमद सिद्दीकी
सम्पादक
जनता की खोज नोएडा

Monday, March 25, 2019

देवबंद दारुल उलूम

दोस्तो:देवबन्द एक शेहर का नाम हैं जो जिला सहारनपुर यूपी में हैं यंहा पर एक मदरसा हैं जो 314 साल पुराना हैं जिसका नाम दारुल उलूम असगरया है इसके बाजू में एक और मदरसा हैं जिसको दुनया दारुल उलूम देवबन्द के नाम से जानती हैं और पूरी दुनया का सरवे करने के बाद ये भी बताया गया हैं के दुनया का नम्बर वन भी यही मदरसा हैं जो 150 साल पुराना हैं इसमें एडमिशन (दाखला)लेने के लिये पहले इक्जाम (इम्तिहान)देना पढ़ता हैं और येह रमजान के 10 दिन बाद होते हैं इस इक्जाम में तकरीबन 20000 हजार स्टूडेंट शिर्कत करते हैं इनमें से 2000 का एडमिन होता हैं और 4000 हजार पहले से एक्जाम पास होते हैं इसका एक साल का खर्चा 270000000 करोड़ होता हैं येह सब खर्चा मुसलमानो की हलाल कमाई के चंदे से होता हें !
👉इस मदरसे की शुरूआत करने वाले हजरत मौलाना कासिम नानौतवी हैं
👉जब इस मदरसे की शुरूआत की थी उस वक़्त हुकूमत अंर्गेजो की थी हर तरफ से दुशमन हि दुशमन थे और लाखो उलाम ऐ कराम को सूली पर लटका दिया था उस वक़त भारत में इस्लाम का बचाना बहुत मुश्किल था लेकिन हजरत नानौतवी लगातार कोशिश में लगे रहे अल्लाह ने उनकी मेहनत को क़बूल किया और आज पूरी दुनया में उलामा ऐ देवबन्द का चरचा होरहा हैं
इसने हर फितने को हरा कर दीने मोहम्मद स•की हिफाजत की हैं और करता रहेगा इन्शाअल्ला.      इतना शेयर करो कि दारुल उलूम के खिलाफ बोलने वालों की आंखें खुली की खुली रह जाए

Sunday, March 24, 2019

सरकारी नोकरी और मुसलमान

*हम उर्दू वाले*

बचपन से सुनते आए हैं, आज भी  कम पढ़े लिखे मुस्लिमो में ये बात आम है कि मुसलमानों को सरकारी नोकरी नही मिलती।
मुस्लिमो के साथ भेदभाव किया जाता है। एक कम अक़्ल जाहिल इंसान ये बात कहे तो समझ आती है पर क्या हम जैसे दानिश मंद और तालीम के ठेकेदार ये बात कहें तो बेईमानी हैं।
पर हमारे पास इसका एक माक़ूल जवाब तो हैं कि सरकारी जॉब हासिल करने के लिए पहले ज़रूरी है क़ाबलियत।

आज रिज़ल्ट के बाद अपने फिक्रमन्द साथियों का गुस्सा और अफ़सोस देखते हुए लिखने पर मजबूर होना पड़ा।
शमसुद्दीन सर तो इतने ज़्यादा हताश हैं कि क्या बताऊँ??

आज ये मुद्दा इसलिए उठाया गया है कि *TGT urdu female* का शानदार रिज़ल्ट हमारे मुँह पर एक तमाचा है।
135 सीट्स में से बस एक का सिलेक्शन हुआ है।

काफ़ी बहाने होंगे हमारे पास, इसके लिए रह रह कर सरकार और DSSSB को ही कोस रही होंगी हमारी बहने।
पेपर मुश्किल था,
आउट ऑफ सिलेबस था।
ऐसा था, वैसा था।

शायद दुनिया जहान से बाहर की बातें पूछ ली होंगी??
या फिर एलियन्स के द्वारा बनाया हुआ पेपर पकड़ा दिया गया हो??
हो सकता है यहूदियों की ही कोई साज़िश हो??
या ये भी हो सकता है कि DSSB पर अमेरिका का दवाब हो इसलिए टफ पेपर बनाया गया हो..!!

बगैरह बगैरह..

पर क्या हमने खुद अपने गिरेबान में झाँका??
कितना तैयार थे हम इस पेपर के लिए??

ग़ैर मुस्लिमों और अपने ही कुछ मुस्लिमो का ये सोचना है कि..
ये उर्दू वाले तो बस ऐसे ही लग जाते हैं।
लग जाओ ऐसे ही।
लग तो गए 135 में से एक इससे बहतर और क्या होता।
उस एक सीट वाली बहन को सलाम जिनकी वजह से इज़्ज़त की चादर एक काँटे में अटक कर पूरी तरह उड़ी नही।

खैर..
अब सोचना ये हैं कि कमी कहाँ हुए?? ताकि आगे उसके लिए तैयारी कर ली जाए।

1-इसमें सबसे बड़ी गलती है उर्दू के ठेकेदारों की।
जो लोग आज ख़िदमत ए उर्दू का दम भरते हैं, उनके खाते में तनख्वाह इंग्लिश में छपी आती है। तो क्यों टेंशन लें??
हाँ वक़्त आने पर उर्दू के नाम पर दो चार जलसे करवा देंगे।
मुशायरे होंगे और उर्दू मिलन में बिरयानी तोड़ कर खत्म ख़िदमत।

कितने हमारे ऐसे PRT या उर्दू TGT हैं जिन्होंने अपनी क़ौम की बेटियों की रहबरी की??

मुश्किल से दो चार

बाक़ी??

बाक़ी हैं ना,
किसी के पास वक़्त नही हैं
किसी को स्कूल के काम से फुर्सत नही।
कोई बस इसलिए काम करता है कि पहले उसका भला हो या नाम हो उसके बाद ही निकलेंगे घर से।

शमसुद्दीन सर जैसे लोगो का परिवार नही है क्या??
क्या इनको वक़्त पर खाना और सोने की ज़रूरत नही हैं??

बड़े अफसोस की बात है कि उर्दू के ज़रिए नोकरी मिलते ही सबसे पहले हम उर्दू को ही भूल जाते है।
उर्दू के नाम से जो तनख्वाह आती है उसी से अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजते हैं

अगर कोई ये सोच रहा हैं कि हम अकेले क्या कर सकते हैं??
तो आपको कुछ नाम बता दूँ
*मोहम्मद रिज़वान अंसारी*
जिसने अकेले दम पर स्पेशल एडुकेटर की फ़ौज खड़ी कर दी।

*उस्ताद शमसुद्दीन सर*
किसी के सर के बाल गिने जा सकते  हैं पर *शम्स सर* की क़ौम की खिदमते गिनना मुश्किल है।

*उस्ताद नईमुद्दीन सर*
जिनकी कोचिंग से सभी वाक़िफ़ हैं।

2- दूसरे दर्जे पर ज़िम्मेदार वो लोग हैं जो उर्दू के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं।
ना हम आज तक उर्दू का अच्छा स्टडी मटेरियल बना सके ताकि क़ौम को फायदा हो सके।

कोचिंग वाले भी बस पहले पेपर को तैयार करवा कर मैदान में भेज देते हैं ये सोच कर कि..
उर्दू तो ये खुद कर लेंगे, इसमे है ही क्या??

ना अच्छी कोचिंग है
ना अच्छी किताबें हैं
ना अच्छे उस्ताद हैं

तो फिर रिज़ल्ट यही होना कोई बड़ी बात नही।
अगर नही जागे तो आगे इससे भी बुरा हो सकता है।

3, तीसरे दर्ज पर खुद वही ख्वातीन ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने ये पेपर दिया या आगे देंगी।

हम मानते हैं कि ख़्वातीन के लिए बहुत सी लिमिट्स हैं।

पर जब आपने जॉब के अप्लाई किया ही था तो ज़रा तो रहम करतीं??
सब कुछ ऐसे ही नही हो जाता, जैसे आप सबने सोच लिया।

वो ज़माने गए जब उर्दू को हलवा समझा जाता था।

सिर्फ फार्म भरने से आपका काम खत्म नही हो जाता।

बड़े अफसोस की बात है कि आज हमारी बहनो के पास tik tok ओर हुस्न दिखाने का वक़्त है pub G पर घण्टों बरबाद कर देंगी लेकिन अपने मुस्तक़बिल के लिए इतना वक़्त नही है कि ढंग से तैयारी ही कर लेती।

कौन करें तैयारी, और क्यों करें??

किसी के शौहर बहुत अच्छा कमा रहे हैं।
तो कोई पहले ही PRT टीचर है तो क्या बेकार में किताबों में सर फोड़ें??

कोई तो कॉट्रेक्ट पर 10 साल गुजारने के बाद सिर्फ इसलिए मुतमइन है कि अब तक कि कमाई में मियाँ के साथ मिलकर प्लाट ले तो लिया है, अब किस बात की हाय तौबा करें??

ख़ैर कहने के लिए बहुत सी बातें हैं पर प्रॉब्लम का ज़िक्र करके उतना फायदा नही जितना उसका हल खोजने में।

अब वक़्त है सर जोड़ कर बैठो और सोचो कि आगे करना क्या है??

दौलत और शौहरत की फ़िक़्र ना करते हुए, ख़ालिस क़ौम के लिए सोचने का वक़्त है।

लोग हँस रहें हैं हम पर, अब नही जागे तो कब जागेंगे??

जो भी साथी अपनी क़ाबलियत और ताकत के हिसाब से जो कर सकता है वो करो।

जिसको समझाना आता है वो समझाओ।
जिसको पढ़ाना आता है वो पढ़ाओ।
जिसको लिखना आता है वो लिखो।
लोगो को गाइड करें।

मेरी उन सभी साथियों से ये गुज़ारिश है जो TGT उर्दू बनने का ख़्वाब सजाए बैठे है कि वो अपनी तरफ से कोई कमी ना छोड़े। अपनी तरफ से अपना बेस्ट करें। जहाँ तक रहबरी का सवाल है उसके लिए हम सब आपके साथ हैं इन्शाल्लाह।

यहाँ ये बात भी क़ाबिल ए गौर है कि..
अगर DSSSB की तरफ से कोई ना इंसाफी या टेक्निकल फाल्ट दिखता है तो उसको दूर करने के किये *शम्स सर* की अगुवाई में पूरी टीम आपके साथ है।
पर अगर कमज़ोरी आपकी तरफ से हुई तो उसकी भरपाई कौन करेगा??

ये शम्स, रिज़वान, वसीम, अरशद, शाहिद सर, एजाज़, नईम सर या में आपको बस रास्ता ही तो दिखा सकते हैं उस पर चलना तो आपको खुद होगा।

आप मिलकर अपनी खोई हुई इज़्ज़त को दुबारा हासिल करें।

ये अहद करें कि अगली बार इन्शाल्लाह 100% सीट्स भरनी हैं।

ये काम तेरा या मेरा नही, ये हम सबका काम है।

रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज नोएडा

कर्ज़ वाली दुल्हन

*कर्ज़ वाली लड़की*

एक 15 साल के भाई ने अपने वालिद से कहा "अब्बूजान बाजी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है" अभी जीजाजी ने फोन पर बताया।

उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी।

दीनमोहम्मद जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले...

हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में *दहेज* की  बात करने आ रहे हैं.. बोले... *दहेज* के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है..

बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था.. कल को उनकी *दहेज* की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नही कर पाया तो ?"

कहते कहते उनकी आँखें भर आइ..

घर के हर एक शख्स के मन व चेहरे पर फिक्र की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी...लड़की भी उदास हो गयी...

खैर..

अगले दिन समधी समधन आए.. उनकी बखूबी इस्तक़बाल किया गया..

कुछ देर बैठने के बाद लड़के के वालिद ने लड़की के वालिद से कहा" दीनमोहम्मद जी अब काम की बात हो जाए..

दीनमोहम्मद जी की धड़कन बढ़ गयी.. बोले.. हां हां.. समधी जी.. ज़रूर..

लड़के के वालिद ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनमोहम्मद जी कि और खिसकाई ओर धीरे से उनके कान में बोले. दीनमोहम्मद जी मुझे *दहेज* के बारे बात करनी है!...

दीनमोहम्मद जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले बताईए समधी जी....जो आप को अच्छा लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा..

समधी जी ने धीरे से दीनमोहम्मद जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा.....

आप लडकि कि बिदाई में कुछ भी देगें या ना भी देंगे... थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे.. मुझे सब कबूल है... पर *कर्ज लेकर* आप एक रुपया भी *दहेज मत देना.* वो मुझे कुबूल नहीं..

क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी *"कर्ज वाली लडकि"* मुझे कुबूल नही...

मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए.. जो मेरे यहाँ आकर मेरे घर को बरकतों से भर देगी..

दीनमोहम्मद जी हैरान हो गए.. उनसे गले मिलकर बोले.. समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा...!

*सबक :-  कर्ज वाली लडकि ना कोई बिदा करें न ही कोई कबुल करे.*

*आज के दिनो मे बहुत सारे मां बाप परेशान है लोग दहेज मांग रहे है, बहुत सारी लडकिया बिना शादी के घरो मे बैठी है, क्यों के उनके पास पैसा नही, 👉गरीबो से निकाह करो,अामीरो के लिए तो लाईन लगी है...!*

*ज़रूरी ऐलान* :- "आओ बनाये निकाह आसान "