(1) आज काफी लड़कियो के माँ बाप अपनी बेटियो की शादी मे बहूत विलंब कर रहे है ।उनको अपने बराबरी के रिश्ते पसंद नही आते और जो बड़े घर पसंद आते है उनको लड़की पसंद नही आती, शादी की सही उम्र 22 से 25 तक है पर आज के माँ बाप ने और अच्छा करते करते उम्र 30 से 36 कर दी है जिससे उनकी बेटियो की खूबसूरती भी कम होती जाती है और बड़े लड़के से शादी होने के उपरांत वो लड़का उस लड़की को वो प्यार नही दे पाता जिसकी हकदार वो लड़की है। समाज मे 30% डिवोर्स की वजह परिवारों द्वारा यही बताई जा रही है। आज उमर छोटी हो चुकी है पहले की तरह 100+ या 80+ नही होती, अब तो केवल 65+ तक जीने को मिल पायेगा इसी वजह से आज लड़के उमर से पहले ही बूढ़े नजर आते है,सर गंजा हो जाता है।
(2) आज ज्यादातर लड़की वाले लड़के वालो को वापस हाँ /ना का जवाब नही दे रहे है, संभवत कुछ लोग मंन मे आपको बुरा भला बोलते होंगे आप अपनी लाड़ली का घर बसाने निकले है, किसी का अपमान करना अच्छा नही होता कृपया आप लड़के वालो से सम्मान जनक जरूर बात करे।
(3) कुंडली जिन्होंने मिला के रिश्ते किये आज उनके भी रिश्ते टूटे है फिर आप लोग क्यो कुंडली का जिक्र कर के रिश्ता ठुकरा देते है इतिहास गवाह है हमारे पूर्वजो जो ने शायद कभी कुंडली नही मिलायी और सकुशल अपनी शादी की 75 वी सालगिरह तक मनाई, आप कुंडली को माध्यम बनाके बच्चों को घर मे बिठा के रखे है उमर बढ़ती जा रही है, आता जाता हर यार दोस्त रिश्तेदार सवाल कर जाता है, कब कर रहे हो शादी आपसे 10 वर्ष कम आयु के लोगो को 8 साल के बच्चे भी हो गए ओर आप 32-35 मे शादी करेंगे तो आपके बच्चों की शादी के वक्त आप अपने ही बच्चों के दादा दादी नजर आएंगे।
(4) आप घर कैसा भी चयन करे लड़की का भाग्य उसके पैदा होने से पहले ही भगवान ने लिख दिया है, भाग्य मे सुख लिखे है तो अंधेरे घर मे भी रोशनी कर देगी दुख लिखे है तो पैसे वाले भी डूब जाते है।
(5) अंतिम मे बस इतना ही कहना है कि अपने बच्चों की उम्र बर्बाद ना करे, गयी उम्र लौट कर नही आती दुसरो को देख कर अपने लिए वैसा रिश्ता देखना मूर्खता है आप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के दुख को समझिए रिश्ता वो करिये, जिस लड़के वालो मे लालच ना हो, लड़का संस्कारी हो, जो आपकी बेटी को प्यार करे, उसकी इज्जत करे, उम्र बहूत छोटी है आप इतने जमीन जायदाद देख कर क्या कर लेंगे कौन अपने साथ एक तिनका भी ले जा पाया है। बच्चों की बाकी उम्र उनके जीवन साथी के साथ जीने दीजिये समय बहुत बलवान है आज की लडकिया पढ़ी लिखी है वो अपने परिवार के साथ कुछ अच्छा तो कर ही सकती है।
Wednesday, September 26, 2018
मां बाप को सोचना होगा
Monday, September 17, 2018
भिखारियों की गिनती में आ चुके मुसलमान
सोशल मीडिया पर आठ सालों में कई अनुभव हुए हैं, उनमे एक अनुभव ये भी हुआ है कि इस प्लेटफॉर्म पर मौजूद मुसलमानो की बड़ी तादाद अभी भी एक महदूद दायरे में चक्कर काट रही है, तालीम की बात की जाये तो उन्हें मदरसों पर खतरा मंडराता नज़र आने लगता है, कईयों को दुनियावी तालीम बदकारी और मज़हब से दूर ले जाने वाली बुराई लगती है, उस पर अगर मुस्लिम औरतों की तालीम की बात की जाये तो हज़ार तर्कों के साथ ना नुकुर और अगर मगर वालों की भीड़ आ खड़ी होती है !
इतिहास में पीछे जाकर देखे तो पता चलता है कि मुसलमानों ने इस्लाम और इस्लामी नज़रिये का गहरा मुताला किया, वो तालीम के बारे में बिल्कुल साफ नज़रिया रखते थे, तालीम ही उनके नज़रियें को विस्तार देती थी, जिससे उनकी अक़ली (बौद्धिक) कुव्वत बढ़ जाती थी, और उन्हे दूसरों का टीचर (अध्यापक) बनाती थी ! इसका नतीजा ये हुआ कि वो अपने वक़्त की सुपरपावर बन गऐ जिन्होंने ने साइंस और तालीम के क्षेत्र में बहुत बडी़ तादाद में योगदान दिया !
मगर आज का मुसलमान तालीम से दूर होता जा रहा है, उसकी प्राथमिकताओं में तालीम शायद सबसे निचले पायदान पर है, एक बार कहीं पढ़ा था कि "मुसलमानों को कभी कोई युनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज माँगते हुए नहीं देखा, कभी न ही वो अपने इलाक़े में अस्पताल के लिए आंदोलन चलाते हैं और न ही बिजली पानी के लिए, उन्हें चाहिए तो बस एक चीज़. लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अज़ान देने की इजाज़त, ये इजाज़त छीन लेने भर की खबर पर सड़कों पर निकल आते हैं !!"
मैंने एक बार मौलाना डॉ. कल्बे सादिक साहब के बयान वाली एक पोस्ट शेयर की थी जिसमें उन्होंने कहा कि "मस्जिदों और इमामबाड़ों में ग्रेनाइट चमकाने से कौम की तरक्की नहीं होने वाली। इससे बेहतर है कि स्कूल और कॉलेजों को बढ़ावा दिया जाए !" इस पोस्ट पर भी मुसलमानो ने जमकर लठैती की थी, उनका इस बयान पर नजरिया एक तरफ़ा था, कल्बे सादिक साहब का कहने का मतलब यही था कि भले ही मस्जिदों और इमामबाड़ों को ग्रेनाइट से चमकाईये मगर साथ ही तालीम को प्राथमिकता के तौर पर लिया जाना चाहिए, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के लिए तालीम ही एक ज़रिया है ! स्कूल-कॉलेज भी बनाएं ताकि कौम के साथ सबको इसका लाभ पहुंचे,कौम तरक्की करे और अच्छा समाज बन सके !
मगर अभी भी हमारी प्राथमिकताएं नहीं बदली हैं, ना ही सोच ना ही नज़रिया, ये एक कड़वी सच्चाई है, कल परसों की ही बात है, जैकी चेन को हज कराने के एक फोटो को जानबूझ कर शेयर किया था, और उस फोटो पर मुसलमानो की प्रतिक्रिया सामने रखी थी, और साथ ही एक पोस्ट भारतीय मूल की मुस्लिम औरत हलीमा याकूब के सिंगापुर की राष्ट्रपति बनने की खबर शेयर की थी, मगर प्रतिक्रिया बहुत ही ढंडी थी, जैकी चेन के उस फोटो की दलील इसलिए दे रहा हूँ कि ये और इस जैसी बहुत सी पोस्ट्स , जैसे किसी बड़े गैर मुस्लिम सेलेब्रिटी के इस्लाम क़ुबूल कर लेने की झूठी खबर, चाँद से किसी मस्जिद को देखकर इस्लाम क़ुबूल कर लेने की खबर, और इन झूठी ख़बरों पर तारीफ करते टूट पड़ना, उन्हें हज़ारों की तादाद में शेयर करना, एक बड़ी मिसाल है हमारी प्राथमिकताओं की !
कभी जब तालीम के क्षेत्र में पिछड़ने की बात महसूस होती है तो इस्लामी इतिहास की किताबें खोल कर अतीत की उपलब्धियों का बखान करने लगते हैं, इससे क्या साबित होता है ? यही न कि आपका अतीत सुनहरा था, आपने उसका क्या हाल किया ? ये बताइये कि आपका वर्तमान क्या है, और मुस्तक़बिल के लिए तालीम-ओ-तरक़्क़ी के लिए आप क्या जद्दो जहद कर रहे हो ?
इतिहास की पोटली खोल कर रखने की मनाही नहीं है, नयी नस्ल के लिए ये ज़रूरी भी है, मगर साथ ही वर्तमान में नयी इबारत लिखने की कोशिशें भी जारी रखना चाहिए, तभी मुस्तक़बिल रोशन हो सकेगा, सिर्फ इतिहास की पोटली ही हमें निहाल नहीं करने वाली !
इस बात पर शायर बिरजीस राशिद आरफी साहब का ये शेर याद आ जाता है :-
वो अपनी मुफ़लिसी जब भी छुपाने लगता है !
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तो बाप - दादा के क़िस्से सुनाने लगता है !!
जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार बताया गया है कि देश के कुल 3.7 लाख भिखारियों में से हर चौथा भिखारी मुसलमान है, यानी प्रतिशत के हिसाब से सबसे बड़ा प्रतिशत मुसलमान भिखारियों का हुआ !
मुल्क में वोटर लिस्ट में मौजूद भीड़ से नहीं बल्कि पढ़ लिख कर ओहदों पर पहुँचने वाली भीड़ के तौर पर गिनती बढ़ाइये
Sunday, September 16, 2018
खुदा का बनाया बहतरीन व अद्धभुत शाहकार है इंसान
*जबरदस्त फेफड़े*
हमारे फेफड़े हर दिन 20 लाख लीटर हवा को फिल्टर करते हैं. हमें इस बात की भनक भी नहीं लगती. फेफड़ों को अगर खींचा जाए तो यह टेनिस कोर्ट के एक हिस्से को ढंक देंगे.
*ऐसी और कोई फैक्ट्री नहीं*
हमारा शरीर हर सेकंड 2.5 करोड़ नई कोशिकाएं बनाता है. साथ ही, हर दिन 200 अरब से ज्यादा रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है. हर वक्त शरीर में 2500 अरब रक्त कोशिकाएं मौजूद होती हैं. एक बूंद खून में 25 करोड़ कोशिकाएं होती हैं.
*लाखों किलोमीटर की यात्रा*
इंसान का खून हर दिन शरीर में 1,92,000 किलोमीटर का सफर करता है. हमारे शरीर में औसतन 5.6 लीटर खून होता है जो हर 20 सेकेंड में एक बार पूरे शरीर में चक्कर काट लेता है.
*धड़कन, धड़कन*
एक स्वस्थ इंसान का हृदय हर दिन 1,00,000 बार धड़कता है. साल भर में यह 3 करोड़ से ज्यादा बार धड़क चुका होता है. दिल का पम्पिंग प्रेशर इतना तेज होता है कि वह खून को 30 फुट ऊपर उछाल सकता है.
*सारे कैमरे और दूरबीनें फेल*
इंसान की आंख एक करोड़ रंगों में बारीक से बारीक अंतर पहचान सकती है. फिलहाल दुनिया में ऐसी कोई मशीन नहीं है जो इसका मुकाबला कर सके.
*नाक में एंयर कंडीशनर*
हमारी नाक में प्राकृतिक एयर कंडीशनर होता है. यह गर्म हवा को ठंडा और ठंडी हवा को गर्म कर फेफड़ों तक पहुंचाता है.
*400 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार*
तंत्रिका तंत्र 400 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से शरीर के बाकी हिस्सों तक जरूरी निर्देश पहुंचाता है. इंसानी मस्तिष्क में 100 अरब से ज्यादा तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं.
*जबरदस्त मिश्रण*
शरीर में 70 फीसदी पानी होता है. इसके अलावा बड़ी मात्रा में कार्बन, जिंक, कोबाल्ट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट, निकिल और सिलिकॉन होता है.
*बेजोड़छींक छींकतेसमय बाहर निकले वाली हवा की रफ्तार 166 से 300 किलोमीटर प्रतिघंटा हो सकती है. आंखें खोलकर छींक मारना नामुमकिन है.
*बैक्टीरिया का गोदाम*
इंसान के वजन का 10 फीसदी हिस्सा, शरीर में मौजूद बैक्टीरिया की वजह से होता है. एक वर्ग इंच त्वचा में 3.2 करोड़ बैक्टीरिया होते है
*ईएनटी की विचित्र दुनिया*
आंखें बचपन में ही पूरी तरह विकसित हो जाती हैं. बाद में उनमें कोई विकास नहीं होता. वहीं नाक और कान पूरी जिंदगी विकसित होते रहते हैं. कान लाखों आवाजों में अंतर पहचान सकते हैं. कान 1,000 से 50,000 हर्ट्ज के बीच की ध्वनि तरंगे सुनते हैं.
*दांत संभाल के*
इंसान के दांत चट्टान की तरह मजबूत होते हैं. लेकिन शरीर के दूसरे हिस्से अपनी मरम्मत खुद कर लेते हैं, वहीं दांत बीमार होने पर खुद को दुरुस्त नहीं कर पाते.
*मुंह में नमी*
इंसान के मुंह में हर दिन 1.7 लीटर लार बनती है. लार खाने को पचाने के साथ ही जीभ में मौजूद 10,000 से ज्यादा स्वाद ग्रंथियों को नम बनाए रखती है.
*झपकती पलकें*
वैज्ञानिकों को लगता है कि पलकें आंखों से पसीना बाहर निकालने और उनमें नमी बनाए रखने के लिए झपकती है. महिलाएं पुरुषों की तुलना में दोगुनी बार पलके झपकती हैं.
*नाखून भी कमाल के*
अंगूठे का नाखून सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ता है. वहीं मध्यमा या मिडिल फिंगर का नाखून सबसे तेजी से बढ़ता है.
*तेज रफ्तार दाढ़ी*
पुरुषों में दाढ़ी के बाल सबसे तेजी से बढ़ते हैं. अगर कोई शख्स पूरी जिंदगी शेविंग न करे तो दाढ़ी 30 फुट लंबी हो सकती है.
*खाने का अंबार*
एक इंसान आम तौर पर जिंदगी के पांच साल खाना खाने में गुजार देता है. हम ताउम्र अपने वजन से 7,000 गुना ज्यादा भोजन खा चुके होते हैं.
*बाल गिरने से परेशान*
एक स्वस्थ इंसान के सिर से हर दिन 80 बाल झड़ते हैं.
*सपनों की दुनिया*
इंसान दुनिया में आने से पहले ही यानी मां के गर्भ में ही सपने देखना शुरू कर देता है. बच्चे का विकास वसंत में तेजी से होता है.
*नींद का महत्व*
नींद के दौरान इंसान की ऊर्जा जलती है. दिमाग अहम सूचनाओं को स्टोर करता है. शरीर को आराम मिलता है और रिपेयरिंग का काम भी होता है. नींद के ही दौरान शारीरिक विकास के लिए जिम्मेदार हार्मोन्स निकलते हैं.
Saturday, August 4, 2018
अब भा ज पा को सिर्फ हिंदुत्व का सहारा
अभी तक भा ज पा हर बार चुनाव जीतने के तीन ही संकल्प लेकर वोटरों को आकर्षित करती रही है - राम मंदिर, समान आचार संहिता और धारा 370 .अब दूसरी बार भा ज पा की सरकार बनी है और अपने शासन के चार साल पूरे भी कर चुकी है लेकिन ये संकल्प न कभी पूरे हुए और न हो सकते हैं ।जनता की नज़र में ये मुद्दे अब अपना महत्व खो चुके हैं ।न नौ मन तेल हो पा रहा है और न राधा के नाचने की कोई संभावना है ।भा ज पा हमेशा हिन्दू और हिन्दुत्व के नाम पर वोट माँगती आई है ।कार्य प्रदर्शन , जन कल्याण और सफल प्रशासन के मुद्दे कांग्रेस के हैं अतः भा ज पा इनकी बात ही नहीं करती ।
चार साल में बहुत पानी यमुना में बह चुका । 2019 का चुनाव करीब आ रहा है ।फिर चार राज्यों के विधान सभा चुनाव तो एकदम सिर पर आ पहुँचे ।भा ज पा किन मुद्दों पर वोट माँगे ? नोट बन्दी पर ? जी एस टी पर ? किसानों की बदहाली पर ? पेट्रोल की कीमतों पर ? देश की पूँजी के पलायन पर ? तमाम कारण ऐसे पैदा हो गये हैं जिनके लिये अब नये बहाने काम नहीं आ रहे हैं ।पलटवार की भी कोई सीमा होती है ।कहाँ तक किये जाएँ ? भा ज पा का प्रचार तंत्र उसकी गिरती हुई साख को बचाने में जी जान से लगा हुआ है पर बात बन नहीं पा रही है ।
भा ज पा के पास ले दे कर अब हिन्दुत्व का ही सहारा बचा है -
एक भरोसो , एक बल, एक आस बिस्वास ।
वही हिन्दुत्व उसका तारणहार है ।वही संकट मोचन है ।भा ज पा अपने पारंपरिक हिन्दू वोटरों को एक नये मोहपाश में बाँध रही है ।आसाम में एन सी अार के मुताबिक चालीस लाख लोग वहाँ के नागरिकों में शामिल नहीं पाये गये हैं ।इनमें से अधिकांश बंगलादेशी घुसपैठिये मुसलमान हैं ।अब इन सबको खदेड़ कर भगा दिया जायेगा ।अब पूरे देश में असली नागरिकों का पंजीकरण कराया जाएगा ।तब इतने ही मुसलमान और पकड़ में आएँगे ।इन सब को यहाँ से बोरिया बिस्तर समेट कर जाना होगा ।हिन्दुओं के संतोष के लिये यह एक राम बाण है ।बहुत दिनों से उनको समझाया जा रहा है कि मुसलमान चार शादियाँ करते हैं ।आठ बच्चे पैदा करते हैं ।इनको हटाया नहीं गया तो कुछ दिनों में ये बहुमत में आ जायेंगे ।ऊपर से ये बंगलादेशी घुस पैठिये मुँह उठाए चले आए हैं ।इनको यहाँ रहने का कोई हक नहीं है ।भारत को मुस्लिम मुक्त करना है ।
आव्रजन की समस्या सभी देशों में है ।लोग किसी न किसी बहाने विकसित देशों में प्रवेश कर जाते हैं फिर जैसे तैसे ग्रीन कार्ड बनवा कर वहाँ की नागरिकता हासिल कर लेते हैं ।अमेरिका भी अवैध रूप से वहाँ रह रहे भारतीयों को वापस भेजने की बात करता है किन्तु यह हो नहीं पाता ।मैक्सिको से तो वहाँ इतने लोग चले आते हैं कि अब ट्रंप मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने जा रहे हैं ।हम भी कह रहे हैं कि इन बंगला देशियों को वापस भेज देंगे किन्तु क्या यह इतना आसान है ? जो सैंतालिस साल से यहाँ बसे हुए हैं , जो इतने साल से टैक्स दे रहे हैं , वोट डाल रहे हैं उनको वापस भेजना संभव नहीं ।राजीव गाँधी ने 1985 में आसाम समझौता किया था । तब जो 1971 की समय सीमा तय की थी उस पर तब के तभी अमल किया जा सकता था ।किन्तु तीन करोड़ व्यक्तियों की नागरिकता प्रमाणित करना एक बेहद पेचीदा काम था जो समय से पूरा नहीं हो पाया और तैंतीस साल निकल गये । हो तो अब भी नहीं पाया है पर सरकार को एक मुद्दा मिल गया ।सोचने वाली बात है कि आज के दिन सन 71 के आव्रजन की सीमा तय करना सर्वथा अनुचित और अमानवीय है ।यह सीमा पाँच से सात साल की होनी चाहिये थी ।जो बहुत पहले से बसे हुए हैं उनको ग्रीन कार्ड जैसी नागरिकता देने की बात सोची जा सकती है ।या कोई और रास्ता निकाला जा सकता है पर देश निकाला दे देना इस समस्या का समाधान नहीं।इस तरह तो हम समस्या के समाधान के नाम पर तमाम नयी समस्याओं को आमंत्रित कर लेंगे ।
इतनी बड़ी संख्या में लोग यहाँ हमला करने या लूट पाट करने नहीं आए हैं ।सब के सब रोजगार और जीवन यापन के साधनों की तलाश में ही आते रहे हैं ।इनका आना वैसे ही लेना चाहिये जैसे भारतीय नागरिक अमेरिका या कैनेडा में अवैध तरीके से घुस जाते हैं ।वहाँ भी इसका घोर विरोध होता है पर झगड़ा मानवीय स्तर का है ।हमारे देश में इसे विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक मसला माना जा रहा है ।इसे सांप्रदायिक रंग देकर उसका राजनैतिक लाभ उठाने से सरकार को रोका नहीं जा सकता है ।
आसाम के चुनाव में प्रधान मंत्री ने यह तुरुप चाल चली थी कि हम बंगलादेशी घुसपैठियों को यहाँ से निकाल बाहर करेंगे ।अब चार राज्यों के चुनाव में भी हिन्दू वोटरों का इस वायदे पर भरोसा बना रहा तो इसका बहुत बड़ा लाभ सत्ता पक्ष को मिलेगा ।जो भी इसका विरोध करेगा वह देश द्रोही कहलाएगा ।समझने वाले तो समझ रहे हैं कि यह वैसा ही अधूरा संकल्प है जो पूरा तो नहीं होगा किन्तु वोट दिलाने वाली कामधेनु बना रहेगा ।नागरिकों की पहचान का काम अभी भी मुकम्मल तौर पर नहीं हो पाया है पर चुनाव जिताने के लिये संजीवनी ऊर्जा रखता है राम मंदिर कहाँ बन पाया ? समान आचार संहिता कहाँ लागू हुई ? धारा 370कहाँ हटी ? पर वोट तो वायदों पर ही मिलता है।पिछले वायदे तो पन्द्रह लाख के वायदों की तरह खोटे निकल गये ।इस नये वायदे में नयी चमक दमक है ।नया भरोसा है ।सरकार को इसकी सख्त जरूरत है ।सरकार का लक्ष्य बस इतना ही है । जैसे भी संभव हो , सत्ता मिले और मिलने के बाद किसी भी कीमत पर बनी रहे ।फिर और क्या चाहिये ?
Friday, July 27, 2018
परदे की आड़ में तालीम से दूर
परेशान है आयशा (रज़ि ) की बेटियां ,फातिमा(रज़ि ) की बहने
मुसलमानो की आधी ताक़त उस वक़्त ख़त्म हो गयी जब साज़िशन औरतो को परदे परहेज़ की आड़ में न सिर्फ तालीम से दूर कर दिया गया बल्कि तरबियत से बिलकुल अलग कर के सिर्फ घरो की चाहरदीवारी में रख दिया गया एक पूरी साज़िश के तहत इस्लाम का रूप रंग बदल कर उसको इतना बेरंग बना दिया गया कि आज मुसलमान औरते गुमराहियों के अंधेरो में गुम होती जा रही है. जिस मज़हब ने दुनिया में औरतो को उसके हक़ दिलाने की शुरुआत की उसी को मानने वालो में औरतो के हालात बहुत बुरे है। इसका नतीजा ये है की कुछ औरते बग़ावत कर के बेहयाई को आधुनिकता के रूप में अपनाने लगी है जब की एक दूसरा ग्रुप खुद को बेहद मज़हबी बनाने की कोशिश में न सिर्फ दुनिया और समाज से दूर कर के दकियानूस हो गया जिसकी वजह से अपनी औलाद और परिवार की भी सही तरबियत नहीं कर पाती। आज मुस्लिम समाज की हकीकत ये है की या तो आधुनिकता के नाम पर बेहयाई या फिर मज़हब के नाम दकियानूस बने हुए । जबकि रसूलल्लाह (सल्ल ) ने बीच के रास्ते को बेहतरीन बताया है। हम उस मां हज़रत आयशा की बेटियां है जो अपनी ही माँ की तरबियत से महरूम हो गयी है जो रसूलल्लाह की तालीम और तरबियत को तमाम औरतो तक पहुँचाती थी। जब तक इस आधी ताक़त को इकठ्ठा नहीं किया जायेगा तब तक इस क़ौम को अंधेरो में ही भटकना पड़ेगा,,,,,,,,,,,,जारी
Saturday, July 21, 2018
हलाला
”हलाला” क्या है?
इसको ज़रूर समझे।
मुस्लिम समुदाय के हलाला के मसाएल को जिस गलत तरह से समाज मे रखा जा रहा है वो बेहद अफ़सोस जनक है। क्योंकि 1% ही मामले हलाला के देखने को मिलेंगे।मुझे नही लगता कि समाज मे बेरोज़गारी,शिक्षा से बढ़ा कोई और मुद्दा है।
फिर भी हलाला क्या है,,इसको सुनिए
क़ुर’आन में अल्लाह ने कहा है कि अगर शौहर अपनी बीवी को तीसरी-तलाक़ दे दे तो फिर वो औरत अपने शौहर के लिए हलाल नहीं रहती, फिर वो औरत अपनी इद्दत का वक़्त गुज़ारने के बाद अपनी इच्छा अनुसार किसी दूसरे आदमी से शादी(निकाह) कर ले फिर इत्तिफाक़ से(याद रहे जान बूझ कर नही) उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शोहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो वो औरत चाहे तो( अपनी मर्ज़ी से) पहले मर्द से(यानि अपने पहले पति से) निकाह कर के उसके लिए जायेज़ या हलाल हो सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैंI
हम शर’ई हुक्म हलाला की ताईद (समर्थन) करते हैं क्योंकि “हलाला” तलाक को रोकने का एक ऐसा बैरियर है जिसे सोचकर ही पुरुष “तलाक” के बारे में सोचना बंद कर देता है।(यहाँ कुछ दोस्तो का कहना है गलती शौहर करे तो उसे औरत क्यूँ भोगे उन्हें बता दूँ कि दूसरी शादी औरत अपनी मर्ज़ी से करती है ज़िन्दगी की नई शुरुआत करने अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरे शौहर के साथ बिताने के लिए) यह व्यवस्था इसलिए है कि कोई भी ऐसी सख्त व्यवस्था से डर कर अपनी बीवी को जल्दीबाजी में तलाक ना दे, अगर हलाला का कानून नहीं बनाया जाता तो शौहर अपनी बीवी को तलाक देकर फिर से शादी की घटनाओं की बाढ़ आ जाती और तलाक महज़ एक मजाक बन कर रह जाता।
हलाला मुख्य रूप से महिलाओं की इच्छा के उपर निर्भर एक स्वतः प्रक्रिया है जिसमे वह तलाक के बाद अपनी मर्जी से खुशी खुशी और बिना किसी पूर्व योजना (हृदय में हलाला का ख्याल तक ना हो) के अन्य पुरुष से सामान्य विवाह कर लेती है और फिर दूसरे विवाह में भी ऐसी परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं कि यहाँ भी निकाह, तलाक की उसी प्रक्रिया के अनुसार टूट जाता है तब ही वह इद्दत की अवधि के बाद पूर्व पति के साथ पुनः निकाह कर सकती है वह भी उसकी अपनी खुशी और मर्जी से।
गौरतलब रहे कि यह पूरी घटना इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है जान बूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई ह!
Tuesday, July 17, 2018
अर एस एस
संघ प्रमुख बनाम प्रणब दा
मेरी तरह बहुत लोगों ने बड़ी उत्सुकता से संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत और भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुना ।दोनों ही भाषणों में जिस प्रत्यक्ष या परोक्ष आक्रामकता की अपेक्षा थी वह बहुत बारीकी से तलाशने पर भी नहीं मिली ।टक्कर तो बराबर की थी ।एक तरफ़ आर एस एस के प्रमुख जो इस समय देश की सर्वोच्च सत्ता के प्रतिनिधि हैं और दूसरी तरफ़ विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठतम और सम्मानित नेता श्री प्रणब मुखर्जी।यह वैचारिक वैषम्य एक घमासान युद्ध का रूप भी ले सकता था । इसी लिये जिज्ञासा का स्तर बहुत ऊँचा था ।
चार साल से हम आर एस एस के लोगों को जिस तरह की असभ्य भाषा और अनर्गल दुष्प्रचार के माध्यम से पहचानते आए हैं उस से संघ प्रमुख को सर्वथा विपरीत रूप में पाया ।भा ज पा के नेताओं और खास तौर पर मोदी जी के एक ही जैसे रटे रटाए भाषण सुनतेसुनते कान पक चुके हैं - सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ, गाँधी और नेहरू ने देश का बँटवारा करा दिया, पटेल को प्रधान मंत्री नहीं बनाया , इमर्जेन्सी लगा दी, वंशवाद चलता है , मुस्लिम तुष्टीकरण होता है वगैरह वगैरह ।पर संघ प्रमुख के उस भाषण में ऐसी कोई बयान बाजी का अनुपस्थित होना सर्वथा अप्रत्याशित था ।संघ प्रमुख और प्रधान मंत्री के विचारों और आचरण में इतना भारी अन्तर क्यों है ? दोनों में से कौन आर एस एस का सही प्रतिनिधि है ? यह एक अहम सवाल हैजिसका जवाब जनता को मिलना चाहिये ।
आर एस एस के पास तीन मुद्दे ही प्रमुख हैं - राम मंदिर , धारा 370 और कामन सिविल कोड ।पर संघ प्रमुख ने इनका ज़िक्र तक नहीं किया ।न उन्होंने देश को मुस्लिम मुक्त करने की घोषणा की और न हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात की जबकि भाषण का विषय राष्ट्रीयता ही था ।।भा ज पा के नेता जिस तरह से मुसलमानों और दलितों की हत्या का अनुमोदन करते हैं वह भी अनुपस्थित था ।न गाय, गोबर और गोमूत्र का महिमामंडन था और न साम्प्रदायिक नफ़रत का ज़हर कहीं देखने को मिला ।तो फिर एक सवाल मन में उठता है कि क्या आर एस एस की सोच का दायरा हिंसा , असहिष्णुता और असभ्यता के बाहर भी कभी हो पाना संभव है ? क्या संघ प्रमुख ऐसी ही बातें संघ के सदस्यों से नहीं करते हैं ? फिर वह लोग संघ प्रमुख की अवहेलना क्या जान बूझ कर करते हैं ?
श्री मोहन भागवत के भाषण में भले ही प्रणब दा के भाषण जैसी शास्त्रीयता , तथ्यात्मक वैविध्य और व्यापकता नहीं थी किन्तु जो आडम्बरहीन सरलता थी उसने मन पर गहरी छाप छोड़ी ।क्या वजह है कि आर एस एस के लोग संघ प्रमुख जैसी भाषा का प्रयोग नहीं करते ? उनकी तरह विविधता में अंतर्निहित एकता को नहीं देख पाते ? दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न नहीं करते ? पूरे देश को एक परिवार के रूप में नहीं देख पाते ? लोक तंत्र का सम्मान नहीं कर पाते ? देश को उस राष्ट्र के रूप में नहीं स्वीकार करते जिसमें सब समान रूप से भागीदार हैं ?
आर एस एस में यह घोर अन्तर्विरोध एक अबूझ पहेली बना हुआ है ।उसे विश्व की सबसे बड़ी संस्था होने का गौरव कोई सैद्धान्तिक सोच रखे बिना हासिल हो गया हो , यह संभव नहीं है ।संघ के कार्यकर्ताओं का अनुशासन और सेवा भाव सदैव प्रशंसित होता है ।संघ के लोग देश के सभी प्रशासनिक और संवैधानिक पदों पर आसीन हैं ।फिर उनके माध्यम से संघ प्रमुख के भाषण वाली सोच का प्रसार आज तक क्यों नहीं हुआ ? जिस प्रकार की सत्ता उसके हाथ में है और जिस प्रकार की सोच संघ प्रमुख की दिखाई दी इन दोनों का समन्वय हो जाता तो देश में सर्वत्र शान्ति और सद्भावना का प्रसार नजर आता ।क्या कारण है कि गले में भगवा अँगौछा डाल कर कैसा भी अपराध करने की छूट हासिल हो जाती है ?क्या कारण है कि मुसलमान की हत्या करने वाले की शोभा यात्रा निकाली जाती है ? क्या कारण है कि बलात्कारियों के समर्थन में भा ज पा के नेता सड़क पर आ जाते हैं ? क्या कारण है कि घोड़े पर बैठने का साहस करने वाले दलित की हत्या कर दी जाती है ? ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके विषय में संघ के विचारकों को आत्म मंथन करना चाहिये ।
उधर कांग्रेसियों को श्री प्रणब मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में जाने पर अकारण ही चिन्ता हो रही थी ।उन्होंने अपने भाषण में राष्ट्रीयता के सभी आयामों का बहुत गुरु गंभीर विश्लेषण किया ।लोग चाहते थे कि वह संघ के खेमे
में जाकर उनकी नीतियों की निन्दा करें, उनको अकल सिखाएँ । किन्तु उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं किया ।केवल कांग्रेस के आदर्शों के आलोक में लोकतंत्र की महत्ता को स्थापित किया ।जिस तरह से संघ प्रमुख ने कोई ओछी बात कहकर कांग्रेस पर कोई प्रहार नहीं किया वैसे ही श्री प्रणब मुखर्जी ने कोई भी निन्दात्मक टिप्पणी नहीं की ।दोनों ने उसी गरिमा का निर्वाह किया जैसी उनसे अपेक्षित थी । बहरहाल इस समारोह में टक्कर तो दो दिग्गजों में थी लेकिन मैच फ़्रेन्ड्ली रहा और अन्त में ड्रा भी हो गया ।न तो एक दूसरे की प्रशंसा की गयी और न निन्दा ।संघ संघ रहा और प्रणब प्रणब ।