रऊफ अहमद सिददीकी की दुनिया में आपका स्वागत है

Sunday, March 24, 2019

सरकारी नोकरी और मुसलमान

*हम उर्दू वाले*

बचपन से सुनते आए हैं, आज भी  कम पढ़े लिखे मुस्लिमो में ये बात आम है कि मुसलमानों को सरकारी नोकरी नही मिलती।
मुस्लिमो के साथ भेदभाव किया जाता है। एक कम अक़्ल जाहिल इंसान ये बात कहे तो समझ आती है पर क्या हम जैसे दानिश मंद और तालीम के ठेकेदार ये बात कहें तो बेईमानी हैं।
पर हमारे पास इसका एक माक़ूल जवाब तो हैं कि सरकारी जॉब हासिल करने के लिए पहले ज़रूरी है क़ाबलियत।

आज रिज़ल्ट के बाद अपने फिक्रमन्द साथियों का गुस्सा और अफ़सोस देखते हुए लिखने पर मजबूर होना पड़ा।
शमसुद्दीन सर तो इतने ज़्यादा हताश हैं कि क्या बताऊँ??

आज ये मुद्दा इसलिए उठाया गया है कि *TGT urdu female* का शानदार रिज़ल्ट हमारे मुँह पर एक तमाचा है।
135 सीट्स में से बस एक का सिलेक्शन हुआ है।

काफ़ी बहाने होंगे हमारे पास, इसके लिए रह रह कर सरकार और DSSSB को ही कोस रही होंगी हमारी बहने।
पेपर मुश्किल था,
आउट ऑफ सिलेबस था।
ऐसा था, वैसा था।

शायद दुनिया जहान से बाहर की बातें पूछ ली होंगी??
या फिर एलियन्स के द्वारा बनाया हुआ पेपर पकड़ा दिया गया हो??
हो सकता है यहूदियों की ही कोई साज़िश हो??
या ये भी हो सकता है कि DSSB पर अमेरिका का दवाब हो इसलिए टफ पेपर बनाया गया हो..!!

बगैरह बगैरह..

पर क्या हमने खुद अपने गिरेबान में झाँका??
कितना तैयार थे हम इस पेपर के लिए??

ग़ैर मुस्लिमों और अपने ही कुछ मुस्लिमो का ये सोचना है कि..
ये उर्दू वाले तो बस ऐसे ही लग जाते हैं।
लग जाओ ऐसे ही।
लग तो गए 135 में से एक इससे बहतर और क्या होता।
उस एक सीट वाली बहन को सलाम जिनकी वजह से इज़्ज़त की चादर एक काँटे में अटक कर पूरी तरह उड़ी नही।

खैर..
अब सोचना ये हैं कि कमी कहाँ हुए?? ताकि आगे उसके लिए तैयारी कर ली जाए।

1-इसमें सबसे बड़ी गलती है उर्दू के ठेकेदारों की।
जो लोग आज ख़िदमत ए उर्दू का दम भरते हैं, उनके खाते में तनख्वाह इंग्लिश में छपी आती है। तो क्यों टेंशन लें??
हाँ वक़्त आने पर उर्दू के नाम पर दो चार जलसे करवा देंगे।
मुशायरे होंगे और उर्दू मिलन में बिरयानी तोड़ कर खत्म ख़िदमत।

कितने हमारे ऐसे PRT या उर्दू TGT हैं जिन्होंने अपनी क़ौम की बेटियों की रहबरी की??

मुश्किल से दो चार

बाक़ी??

बाक़ी हैं ना,
किसी के पास वक़्त नही हैं
किसी को स्कूल के काम से फुर्सत नही।
कोई बस इसलिए काम करता है कि पहले उसका भला हो या नाम हो उसके बाद ही निकलेंगे घर से।

शमसुद्दीन सर जैसे लोगो का परिवार नही है क्या??
क्या इनको वक़्त पर खाना और सोने की ज़रूरत नही हैं??

बड़े अफसोस की बात है कि उर्दू के ज़रिए नोकरी मिलते ही सबसे पहले हम उर्दू को ही भूल जाते है।
उर्दू के नाम से जो तनख्वाह आती है उसी से अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजते हैं

अगर कोई ये सोच रहा हैं कि हम अकेले क्या कर सकते हैं??
तो आपको कुछ नाम बता दूँ
*मोहम्मद रिज़वान अंसारी*
जिसने अकेले दम पर स्पेशल एडुकेटर की फ़ौज खड़ी कर दी।

*उस्ताद शमसुद्दीन सर*
किसी के सर के बाल गिने जा सकते  हैं पर *शम्स सर* की क़ौम की खिदमते गिनना मुश्किल है।

*उस्ताद नईमुद्दीन सर*
जिनकी कोचिंग से सभी वाक़िफ़ हैं।

2- दूसरे दर्जे पर ज़िम्मेदार वो लोग हैं जो उर्दू के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं।
ना हम आज तक उर्दू का अच्छा स्टडी मटेरियल बना सके ताकि क़ौम को फायदा हो सके।

कोचिंग वाले भी बस पहले पेपर को तैयार करवा कर मैदान में भेज देते हैं ये सोच कर कि..
उर्दू तो ये खुद कर लेंगे, इसमे है ही क्या??

ना अच्छी कोचिंग है
ना अच्छी किताबें हैं
ना अच्छे उस्ताद हैं

तो फिर रिज़ल्ट यही होना कोई बड़ी बात नही।
अगर नही जागे तो आगे इससे भी बुरा हो सकता है।

3, तीसरे दर्ज पर खुद वही ख्वातीन ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने ये पेपर दिया या आगे देंगी।

हम मानते हैं कि ख़्वातीन के लिए बहुत सी लिमिट्स हैं।

पर जब आपने जॉब के अप्लाई किया ही था तो ज़रा तो रहम करतीं??
सब कुछ ऐसे ही नही हो जाता, जैसे आप सबने सोच लिया।

वो ज़माने गए जब उर्दू को हलवा समझा जाता था।

सिर्फ फार्म भरने से आपका काम खत्म नही हो जाता।

बड़े अफसोस की बात है कि आज हमारी बहनो के पास tik tok ओर हुस्न दिखाने का वक़्त है pub G पर घण्टों बरबाद कर देंगी लेकिन अपने मुस्तक़बिल के लिए इतना वक़्त नही है कि ढंग से तैयारी ही कर लेती।

कौन करें तैयारी, और क्यों करें??

किसी के शौहर बहुत अच्छा कमा रहे हैं।
तो कोई पहले ही PRT टीचर है तो क्या बेकार में किताबों में सर फोड़ें??

कोई तो कॉट्रेक्ट पर 10 साल गुजारने के बाद सिर्फ इसलिए मुतमइन है कि अब तक कि कमाई में मियाँ के साथ मिलकर प्लाट ले तो लिया है, अब किस बात की हाय तौबा करें??

ख़ैर कहने के लिए बहुत सी बातें हैं पर प्रॉब्लम का ज़िक्र करके उतना फायदा नही जितना उसका हल खोजने में।

अब वक़्त है सर जोड़ कर बैठो और सोचो कि आगे करना क्या है??

दौलत और शौहरत की फ़िक़्र ना करते हुए, ख़ालिस क़ौम के लिए सोचने का वक़्त है।

लोग हँस रहें हैं हम पर, अब नही जागे तो कब जागेंगे??

जो भी साथी अपनी क़ाबलियत और ताकत के हिसाब से जो कर सकता है वो करो।

जिसको समझाना आता है वो समझाओ।
जिसको पढ़ाना आता है वो पढ़ाओ।
जिसको लिखना आता है वो लिखो।
लोगो को गाइड करें।

मेरी उन सभी साथियों से ये गुज़ारिश है जो TGT उर्दू बनने का ख़्वाब सजाए बैठे है कि वो अपनी तरफ से कोई कमी ना छोड़े। अपनी तरफ से अपना बेस्ट करें। जहाँ तक रहबरी का सवाल है उसके लिए हम सब आपके साथ हैं इन्शाल्लाह।

यहाँ ये बात भी क़ाबिल ए गौर है कि..
अगर DSSSB की तरफ से कोई ना इंसाफी या टेक्निकल फाल्ट दिखता है तो उसको दूर करने के किये *शम्स सर* की अगुवाई में पूरी टीम आपके साथ है।
पर अगर कमज़ोरी आपकी तरफ से हुई तो उसकी भरपाई कौन करेगा??

ये शम्स, रिज़वान, वसीम, अरशद, शाहिद सर, एजाज़, नईम सर या में आपको बस रास्ता ही तो दिखा सकते हैं उस पर चलना तो आपको खुद होगा।

आप मिलकर अपनी खोई हुई इज़्ज़त को दुबारा हासिल करें।

ये अहद करें कि अगली बार इन्शाल्लाह 100% सीट्स भरनी हैं।

ये काम तेरा या मेरा नही, ये हम सबका काम है।

रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज नोएडा

कर्ज़ वाली दुल्हन

*कर्ज़ वाली लड़की*

एक 15 साल के भाई ने अपने वालिद से कहा "अब्बूजान बाजी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है" अभी जीजाजी ने फोन पर बताया।

उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी।

दीनमोहम्मद जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले...

हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में *दहेज* की  बात करने आ रहे हैं.. बोले... *दहेज* के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है..

बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था.. कल को उनकी *दहेज* की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नही कर पाया तो ?"

कहते कहते उनकी आँखें भर आइ..

घर के हर एक शख्स के मन व चेहरे पर फिक्र की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी...लड़की भी उदास हो गयी...

खैर..

अगले दिन समधी समधन आए.. उनकी बखूबी इस्तक़बाल किया गया..

कुछ देर बैठने के बाद लड़के के वालिद ने लड़की के वालिद से कहा" दीनमोहम्मद जी अब काम की बात हो जाए..

दीनमोहम्मद जी की धड़कन बढ़ गयी.. बोले.. हां हां.. समधी जी.. ज़रूर..

लड़के के वालिद ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनमोहम्मद जी कि और खिसकाई ओर धीरे से उनके कान में बोले. दीनमोहम्मद जी मुझे *दहेज* के बारे बात करनी है!...

दीनमोहम्मद जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले बताईए समधी जी....जो आप को अच्छा लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा..

समधी जी ने धीरे से दीनमोहम्मद जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा.....

आप लडकि कि बिदाई में कुछ भी देगें या ना भी देंगे... थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे.. मुझे सब कबूल है... पर *कर्ज लेकर* आप एक रुपया भी *दहेज मत देना.* वो मुझे कुबूल नहीं..

क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी *"कर्ज वाली लडकि"* मुझे कुबूल नही...

मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए.. जो मेरे यहाँ आकर मेरे घर को बरकतों से भर देगी..

दीनमोहम्मद जी हैरान हो गए.. उनसे गले मिलकर बोले.. समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा...!

*सबक :-  कर्ज वाली लडकि ना कोई बिदा करें न ही कोई कबुल करे.*

*आज के दिनो मे बहुत सारे मां बाप परेशान है लोग दहेज मांग रहे है, बहुत सारी लडकिया बिना शादी के घरो मे बैठी है, क्यों के उनके पास पैसा नही, 👉गरीबो से निकाह करो,अामीरो के लिए तो लाईन लगी है...!*

*ज़रूरी ऐलान* :- "आओ बनाये निकाह आसान "

Tuesday, March 19, 2019

तालीम की अहमियत को समझें मुसलमान

मैं शुरू से कहता हूं कि सुधार की आवाज आम मुस्लिम के अंदर से उठनी चाहिए ...

मैं मुस्लमान हूँ,
मै प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री   नही बन सकता, क्योकि मेरी तादाद कम है और जातिवाद ज्यादा,  लेकिन मैं कलेक्टर, एडीएम, तहसीलदार, कमिश्नर, एसपी, डीएसपी तो बन ही सकता हूँ।
     लेकिन मै निकम्मा हूं

       मुझ से घंटो पढ़ाई नही होती, अगर मैं पढ़ने लग गया तो चौराहों की रौनकें ख़त्म हो जाएगी, जो की मै होने नही दूंगा, मै पढ़ गया तो गुटखा, ताश पत्तियां छूट जाएगी जो की मै छोड़ना नही चाहता।
        मै पढ़ गया तो मुहल्ले की रौनक कम हो जाएगी, दिन भर आवारा गिर्दी इन्ही मुहल्ले में ही तो करता हूँ मै,  हां! काम नही है मेरे पास, लेकिन क्या फ़र्क़ पढता है, अल्लाह दो वक़्त की रोटी तो खिला ही देता है ना!

     हां मै मुसलमान हूँ, और पैदा होते है एक सील ठप्पा लग गया था मेरी तशरीफ़ पर कि मै पंचर की दूकान खोलूंगा या हाथो में पाने पकड़ कर गाड़ियां सुधारूँगा, या बहुत ज्यादा हुआ तो दूसरों की गाड़ियां चलाऊंगा।
       हां मै मुसलमान हूँ, , अपने भाइयो की टांग खिंचाई, मेरा अहम शगल है।
   
     आखिर मै क्यों नही पढा ?  या मै क्यों नही पढ़ नही पाया? ये सवाल हो सकता है! लेकिन मैं अनपढ़ हूं इसमें शक नही!

       हां मै मुसलमान हूं,और हिंदुस्तान में 30 करोड़ हुँ , लेकिन मै ज्यादातर अनपढ़, गरीब, गन्दी बस्तियों में ही हूं, इसका दोष मै दुसरो पर मंढता हूं, मै चाहता हूँ कि मेरे घर आंगन की झाड़ू लगाने भी सरकार आये।

    मै मुसलमान हूं, घर के सामने अतिक्रमण करना भी मेरा अहम शग़ल है, मै पंद्रह फिट की रोड को आठ फिट की करने मै भी माहिर हुँ, फिर उस आठ फिट की रोड़ पर रिक्शा खड़ी करना भी मेरा अधिकार है, हां मै मुसलमान हूँ, जिसका धर्म 'पाकी आधा ईमान', 'तालीम अहम बुनियाद है' मानने वाला है लेकिन मै इस पर कभी अमल नही करता ।
       मै हमेशा सउदी अरब दुबई जैसे देशों की दुहाई देकर अपनी बडाइयां करता हूँ, लेकिन मैने हिंदस्तान में खुद पर कभी कोई सुधार नही किया, न मै सुधरना चाहता हूँ।
हां मै मुसलमान हूं, मै अनपढ़ हूँ, क्यों की माँ-बाप ने बचपन से गैरेज पर नौकरी से लगाया और मै गरीब घर से हुँ।

      बेहतर तालीम देने के लिए माँ-बाप के पास रुपया नही है, और मेरी कौम तालीम से ज्यादा लंगर को तवज्जोह देती है, वो खिलाने मात्र को सवाब समझती है।

      मै मुसलमान हूं, मै खूब गालियां देता हूं, मै रिक्शा चलाता हूं, दूध बेचता हूं वेल्डिंग करता हूं मै गैरेज पर गाड़िया सुधारता हु, मै चौराहे पर बैठ कर सिगरेट पीता हूं,गांजा पिता हूं, ताश पत्ते खेलता हूं, क्योंकी मै अनपढ़ हूं, और मै अनपढ़ सिर्फ दो वजह से हूं, एक–माँ-बाप की लापरवाही, दूसरा –कौम के जिम्मदारो की लापरवाही ।
      माँ-बाप मजबूर थे, लेकिन मेरी कौम मजबूर न थी, न है! मैने आंखो से देखा है लाखो रुपयों के लंगर कराते हुए, मैने आँखों से देखा है लाखों रुपए कव्वाली पर उड़ाते हुए, मैने आँखों से देखा है बेइंतहा फ़िज़ूल खर्च करते हुए।
   काश! मेरे माँ-बाप या मेरी कौम मेरी तालीम की फ़िक़्र मंद होती तो आज मै प्रधान मंत्री या मंत्री न सही, लेकिन मैं आज क्लेक्टर, एडीएम,कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर होता, बिना वोट पाये भी लाल बत्ती में होता, या कम से कम मै डॉक्टर,इंजिनियर,आर्किटेक्चर,या एक अच्छा बिजनेस मैन तो होता ही, लेकिन बचपन से मन में एक वहम घर कर गया है, "कि मियां तुम मुसलमान हो और मुसलमानो को यहाँ नौकरी आसानी से नही मिलती" लेकिन मैं ये तो भूल ही गया कि मेरे नबी ने तमाम जिंदगी तिजारत ही की और तालीम पर अहम् जोर दिया, फिर मै उनका उम्मती होकर नौकरी न मिलने की बात सोच कर तालीमात क्यों हासिल नही करता ?

  (नोट- दोस्तों ये तहरीर सिर्फ इस्लाही पोस्ट के लिए लिखी गयी है, रिक्शा चला कर पेट पालना या वेल्डिंग करना  दूध बेचना गैरेज के पाने उठाना या मजदूरी करना कोई गलत काम नही, लेकिन हम इसके लिए पैदा हुए है ये सोच कर तालीम हासिल न करना गलत है, खूब पढ़ाई करो, कि हर पद पर सिर्फ तुम दिखो, तुम्हे इज्जत से देखे, तुम पढ़े लिखे तबके में गिने जाओ, अंधविश्वास से दूर एक नयी जिंदगी जीकर मुल्क़ व क़ौम की ख़िदमत करे  और.....जहां प्रोपोगंडा नामक चीज ही न हो, आने वाली नस्लो को पढा लिखा कर हम अब तक के अपने इतिहास को बदल दे, यही एक ललक है कि ये कौम एक नया सवेरा देखे

रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज
समाचार पत्र वे
मासिक पत्रिका

9286868383

Thursday, December 27, 2018

मिर्ज़ा ग़ालिब

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब‘ मर गया पर याद आता है,

आज संडे था न जाने क्या ख्याल आया दिल ने कहा चलो चचा ग़ालिब से मुलाकात की जाय
बल्लीमारन की गली कासीम जान में जाकर एक चाय वाले से पूछना पड़ा हवेली के बारे में

खैर हम उस हवेली के मुख्य द्वार तक
पहुँच गए जो खुला हुआ था. जहां १५० साल पहले उर्दू का
वह महान शायर रहा करता था.जहां १८६९ में ग़ालिब की मौत के बाद फ़ोन बूथ व अन्य
दुकाने खुल गईं थीं , लोगों ने अपना कब्जा कर लिया था.और आज
भी जिसके अधिकाँश हिस्से में यही सब काबिज है. 

सन २००० में भारतीय सरकार की
आँखें खुलीं और उन्होंने इस हवेली के कुछ हिस्से को कुछ कब्जाइयों से छुड़ा कर उस महान शायर की यादों के हवाले कर
दिया। आज उसी छोटे से हिस्से के बड़े से गेट पर चौकीदार  कम गाइड कम परिचर एक बुजुर्गवार बैठे हुए थे.

हमारे अन्दर घुसते ही वे पीछे
पीछे आ गए और जितना उन्हें उस हवेली के छोटे से हिस्से के बारे में मालूम था प्रेम
से बताने लगे.

उन्होंने ही बताया कि सरकार के इस
हिस्से को संग्रहालय के तौर पर हासिल करने के बाद भी कोई यहाँ नहीं आता था, वो तो कुछ वर्ष पहले गुलज़ार के यहाँ आने के बाद यह हवेली लोगों की निगाह
में आई और अब करीब १०० देसी , विदेशी यात्री यहाँ रोज ही आ
जाया करते हैं. 

हालाँकि उनकी इस बात पर उस समय
मेरा यकीन करना कठिन था, क्योंकि जहाँ पहुँचने में हमें इतनी परेशानी हुई थी. वहां
बिना किसी बोर्ड , दिशा निर्देश के कोई बाहरी व्यक्ति किस
प्रकार आ पाता होगा। और उस समय भी और जबतक हम वहां रहे
तब तक, हमारे अलावा वहां कोई भी नहीं आया था. पर शायद यह
बताने के पीछे उन सज्जन का एक और उद्देश्य था – वह शायद
बताना चाहते थे कि,  यूँ तो वह सरकार के कर्मचारी हैं
और निम्नतम तनख्वाह पर ग़ालिब की सेवा करते हैं पर आने जाने वाले यात्री ही कुछ
श्रद्धा भाव दे जाते हैं.

खैर हवेली में प्रवेश करते ही
सामने ग़ालिब की प्रतिमा दिखी जिसे गुलज़ार साहब ने वहां लगवाया है और साइड में
ग़ालिब अपनी बड़ी सी तस्वीर में से कहते जान पड़े –

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है! कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं.

वाकई उस बड़ी सी हवेली के उस छोटे
से हिस्से में कुछ गिना चुना २-४ सामान ही पड़ा हुआ है।  वह फ़िराक़ और वह विसाल कहां,

वह शब-ओ- रोज़ -ओ-माह -ओ -साल कहाँ।

यहाँ तक कि उस बरामदे की छत को भी
अभी हाल में ही कबूतरों के आतंक से तंग आकर बनवाया गया है. कुछ दो चार बर्तन हैं।
 जो ग़ालिब के थे वे तो पिछले दिनों चोरी हो गए , अब उनकी नक़ल रख दी गई है।  कुछ दीवान हैं शायर के, एक चौपड़ , एक शतरंज, और
दीवारों पर शायर की कहानी कहती कुछ तस्वीरें। शायद बस यही रहे हों साथी उनके आखिरी दिनों में , और
शायद इसीलिए उन्होंने कहा –

चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों
के ख़ुतूत,

बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ
निकला ।

हालाँकि वहां उपस्थित उन सज्जन ने
बताया कि सरकार की तरफ से केस चल रहा है और उम्मीद है कि पूरी हवेली को हासिल करके
कायदे से ग़ालिब के हवाले किया जाएगा। क्योंकि ग़ालिब की अपनी सातों  संतानों
में से कोई जीवित नहीं रही अत: उस हवेली का कोई कानूनन वारिस अब नहीं है. लोगों ने
अनाधिकारिक तौर पर कब्जा किया हुआ है. हमने चाहा तो बहुत कि उसकी इस बात पर भरोसा
कर लें. तभी एक बोर्ड पर राल्फ़ रसल के ये शब्द दिखे –

“यदि ग़ालिब अंग्रेजी भाषा में लिखते, तो विश्व एवं इतिहास के महानतम कवि होते “

 मेरे मन में आया – यदि ग़ालिब भारत की जगह इंग्लैण्ड
में पैदा होते, तो वहां इनके नाम का पूरा एक शहर संरक्षित होता।
 भारत में उनके नाम की उनकी गली भी नहीं।

सरकार से तो उम्मीद क्या करनी एक
दरख्वास्त गुलज़ार साहब से ही करने का मन है, एक प्रतिमा हवेली
के अन्दर लगवाई, तो हवेली प्रकाश में आई,कम से कम एक बोर्ड और बल्लीमारान गली के बाहर लगवा दें तो वहां तक आने
वालों को भी कुछ सुविधा हो जाये.

हम उस हवेली से निकल आये उस गली
को पीछे छोड़ आये पर साथ रह गया चचा का यह शेर –

हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन 

खाक़ हो जायेंगे हम तुमको ख़बर
होते तक

Sunday, December 2, 2018

अगर दुआ से मसले हल होते तो,,

मेरे तब्लीगी मुस्लिम मित्रो,
दिल्ली में लाखों किसान जुटे, क्यों? जवाब साफ है किसानों के हक और इंसाफ के लिए।  ऐसे ही तमाम लोग मुल्क में जुटते हैं। गुजरात में दलितों, पाटीदारों ने हक के लिए जुट कर सरकार की नाक में दम कर दिया। भीमा कोरेगांव में दलितों की जुटान भी आपको याद होगी। अभी हाल में महाराष्ट्र में मराठों की एकजुटता ने आरक्षण की जंग जीत ली।
दूसरी तरफ बीते दिनों आप औरगाबाद में 30 लाख की तादाद में जुटे थे, अल्लाह से दुआ के ,जरिए मुसलमानों कि बहबूदी के लिए, आप यूपी में अभी जुटे हो सिर्फ दुआ के लिए। आप ऐसी तब्लीगों में जुटते हो दुआ, सिर्फ दुआ के लिए, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसे दुआओं से आपको क्या हासिल हुआ, ये आप समझ सकते हैं।
दोस्तो अगर दुआओं से सारे मसले हाल होते तो पैगम्बर सल को जंग नहीं लड़नी पड़ती। अगर  तबलीग और दुआ ही हर प्राब्लम की हल होती तो इस्लाम ने आपको जिद्दो जहद की अवधारणा से परिचित ना कराया होता।  जिद्दोजहद का मतलब संगठित संघर्ष होता है।  अगर दुआ ही आपके हर ख्वाब की ताबीर होती तो कुरआन में इकरा (शिक्षा) पर आयत नाजिल न हुई होती। आप अल्लाह से दुआ करते और आपकी सारी दिक्कत खत्म हो जाती। आप इस बात को नहीं समझते, लेकिन भीम राव अम्बेडकर ने इसे समझा और कुरान के शिक्षित बनों, संगठित हो, संघर्ष का नारा दे कर दलितों के बेकार कर दिया, जिसे आप देख ही रहे हैं।
आपको बता दें कि डेढ़ साल पहले औरंगाबाद में तबलीग के जलसे में 4 से 6 सौ करोड़ रुपए खर्च हो गए। अभी पश्चिमी यूपी के जलसे में  सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं। ज़रा सोचिए इस तरह के जलसों पर पिछले 20 सालों में खर्च तकरीबन 10 हजार करोड़ का आधा हिस्सा मॉर्डन एजुकेशन और टेक्निकल और मुस्लिम बच्चों के I.A.S और I.P.S की कोचिंग आदि पर खर्च होता तो आज मुस्लिम नौजवान कहां होता और मुस्लिम कौम कहां होती?
मेरा मानना है कि जब तब्लीगी जमाती हजरात गांव स्तर पर घूम घूम कर तबलीग करते हैं, मस्जिद-मस्जिद पहुंच कर इस्लाम का ज्ञान और दुआओं के महत्व का संदेश देते ही हैं तो ये जगह-जगह लाख से लेकर पैंतीस लाख की भीड़ जुटा कर अरबों रुपए की बरबादी की क्या तुक है। इसे जमावड़े को कम कर कुछ रकम बचा कर इकरा (शिक्षा) मूवमेंट को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन भाई लोग सिर्फ दुआ के बल पर दुनियां से आगे निकल जाने का ख्वाब दिखा कर मुसलमानों को बरगला रहे हैं। सोचिए तो ज़रा।
( कुछ भाई लोग मुझे गाली दें तो भी चलेगा, मगर एक बार इस पर सोंचें तो सही)

सोचना वाली बात सिर्फ इतनी है
कि जंगे ख़दक याद कीजिए जब कुफ्फारे मक्का ने मदीने पर चढ़ाई की तब नबी(स०) ने दुआ की जगह प्रक्टिकल करके दिखाया और उन्होंने खुद कुदाल लेकर खुदाई की और हम नआऊज़ूबिल्लाह नबी के प्रक्टिकल अमल को छोड़ कर दुआओ से सारे मसले हल करने की कोशिश कर रहें हैं

Wednesday, September 26, 2018

मां बाप को सोचना होगा

(1) आज काफी लड़कियो के माँ बाप अपनी बेटियो की शादी मे बहूत विलंब कर रहे है ।उनको अपने बराबरी के रिश्ते पसंद नही आते और जो बड़े घर पसंद आते है उनको लड़की पसंद नही आती, शादी की सही उम्र 22 से 25 तक है पर आज के माँ बाप ने और अच्छा करते करते  उम्र 30 से 36 कर दी है जिससे उनकी बेटियो की खूबसूरती भी कम होती जाती है और बड़े लड़के से शादी होने के उपरांत वो लड़का उस लड़की को वो प्यार नही दे पाता जिसकी  हकदार वो लड़की है। समाज मे 30% डिवोर्स की वजह परिवारों  द्वारा यही बताई जा रही है। आज उमर छोटी हो चुकी है पहले की तरह 100+ या 80+ नही होती, अब तो केवल 65+ तक जीने को मिल पायेगा इसी वजह से आज लड़के उमर से पहले ही बूढ़े नजर आते है,सर गंजा हो जाता है।
    (2) आज ज्यादातर लड़की वाले लड़के वालो को वापस हाँ /ना का जवाब नही दे रहे है, संभवत कुछ लोग मंन मे आपको बुरा भला बोलते होंगे आप अपनी लाड़ली का घर बसाने निकले है, किसी का अपमान करना अच्छा नही होता कृपया आप लड़के वालो से सम्मान जनक जरूर बात करे।
     (3) कुंडली जिन्होंने मिला के रिश्ते किये आज उनके भी रिश्ते टूटे है फिर आप लोग क्यो कुंडली का जिक्र कर के रिश्ता ठुकरा देते है इतिहास गवाह है हमारे पूर्वजो जो ने शायद कभी कुंडली नही मिलायी और सकुशल अपनी शादी की 75 वी सालगिरह तक मनाई, आप कुंडली को माध्यम बनाके बच्चों को घर मे बिठा के रखे है उमर बढ़ती जा रही है, आता जाता हर यार दोस्त रिश्तेदार सवाल कर जाता है, कब कर रहे हो शादी आपसे 10 वर्ष कम आयु के लोगो को 8 साल के बच्चे भी हो गए ओर आप 32-35 मे शादी करेंगे तो आपके बच्चों की शादी के वक्त आप अपने ही बच्चों के दादा दादी नजर आएंगे।
   (4) आप घर कैसा भी चयन करे लड़की का भाग्य उसके पैदा होने से पहले ही भगवान ने लिख दिया है, भाग्य मे सुख लिखे है तो अंधेरे घर मे भी रोशनी कर देगी दुख लिखे है तो पैसे वाले भी डूब जाते है।
    (5) अंतिम मे बस इतना ही कहना है कि अपने बच्चों की उम्र बर्बाद ना करे, गयी उम्र लौट कर नही आती दुसरो को देख कर अपने लिए वैसा रिश्ता देखना मूर्खता है आप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के दुख को समझिए रिश्ता वो करिये, जिस लड़के वालो मे लालच ना हो, लड़का संस्कारी हो, जो आपकी बेटी को प्यार करे, उसकी इज्जत करे, उम्र बहूत छोटी है आप इतने जमीन जायदाद देख कर क्या कर लेंगे कौन अपने साथ एक तिनका भी ले जा पाया है। बच्चों की बाकी उम्र उनके जीवन साथी के साथ जीने दीजिये समय बहुत बलवान है आज की लडकिया पढ़ी लिखी है वो अपने परिवार के साथ कुछ अच्छा तो कर ही सकती है।