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Tuesday, March 19, 2019

तालीम की अहमियत को समझें मुसलमान

मैं शुरू से कहता हूं कि सुधार की आवाज आम मुस्लिम के अंदर से उठनी चाहिए ...

मैं मुस्लमान हूँ,
मै प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री   नही बन सकता, क्योकि मेरी तादाद कम है और जातिवाद ज्यादा,  लेकिन मैं कलेक्टर, एडीएम, तहसीलदार, कमिश्नर, एसपी, डीएसपी तो बन ही सकता हूँ।
     लेकिन मै निकम्मा हूं

       मुझ से घंटो पढ़ाई नही होती, अगर मैं पढ़ने लग गया तो चौराहों की रौनकें ख़त्म हो जाएगी, जो की मै होने नही दूंगा, मै पढ़ गया तो गुटखा, ताश पत्तियां छूट जाएगी जो की मै छोड़ना नही चाहता।
        मै पढ़ गया तो मुहल्ले की रौनक कम हो जाएगी, दिन भर आवारा गिर्दी इन्ही मुहल्ले में ही तो करता हूँ मै,  हां! काम नही है मेरे पास, लेकिन क्या फ़र्क़ पढता है, अल्लाह दो वक़्त की रोटी तो खिला ही देता है ना!

     हां मै मुसलमान हूँ, और पैदा होते है एक सील ठप्पा लग गया था मेरी तशरीफ़ पर कि मै पंचर की दूकान खोलूंगा या हाथो में पाने पकड़ कर गाड़ियां सुधारूँगा, या बहुत ज्यादा हुआ तो दूसरों की गाड़ियां चलाऊंगा।
       हां मै मुसलमान हूँ, , अपने भाइयो की टांग खिंचाई, मेरा अहम शगल है।
   
     आखिर मै क्यों नही पढा ?  या मै क्यों नही पढ़ नही पाया? ये सवाल हो सकता है! लेकिन मैं अनपढ़ हूं इसमें शक नही!

       हां मै मुसलमान हूं,और हिंदुस्तान में 30 करोड़ हुँ , लेकिन मै ज्यादातर अनपढ़, गरीब, गन्दी बस्तियों में ही हूं, इसका दोष मै दुसरो पर मंढता हूं, मै चाहता हूँ कि मेरे घर आंगन की झाड़ू लगाने भी सरकार आये।

    मै मुसलमान हूं, घर के सामने अतिक्रमण करना भी मेरा अहम शग़ल है, मै पंद्रह फिट की रोड को आठ फिट की करने मै भी माहिर हुँ, फिर उस आठ फिट की रोड़ पर रिक्शा खड़ी करना भी मेरा अधिकार है, हां मै मुसलमान हूँ, जिसका धर्म 'पाकी आधा ईमान', 'तालीम अहम बुनियाद है' मानने वाला है लेकिन मै इस पर कभी अमल नही करता ।
       मै हमेशा सउदी अरब दुबई जैसे देशों की दुहाई देकर अपनी बडाइयां करता हूँ, लेकिन मैने हिंदस्तान में खुद पर कभी कोई सुधार नही किया, न मै सुधरना चाहता हूँ।
हां मै मुसलमान हूं, मै अनपढ़ हूँ, क्यों की माँ-बाप ने बचपन से गैरेज पर नौकरी से लगाया और मै गरीब घर से हुँ।

      बेहतर तालीम देने के लिए माँ-बाप के पास रुपया नही है, और मेरी कौम तालीम से ज्यादा लंगर को तवज्जोह देती है, वो खिलाने मात्र को सवाब समझती है।

      मै मुसलमान हूं, मै खूब गालियां देता हूं, मै रिक्शा चलाता हूं, दूध बेचता हूं वेल्डिंग करता हूं मै गैरेज पर गाड़िया सुधारता हु, मै चौराहे पर बैठ कर सिगरेट पीता हूं,गांजा पिता हूं, ताश पत्ते खेलता हूं, क्योंकी मै अनपढ़ हूं, और मै अनपढ़ सिर्फ दो वजह से हूं, एक–माँ-बाप की लापरवाही, दूसरा –कौम के जिम्मदारो की लापरवाही ।
      माँ-बाप मजबूर थे, लेकिन मेरी कौम मजबूर न थी, न है! मैने आंखो से देखा है लाखो रुपयों के लंगर कराते हुए, मैने आँखों से देखा है लाखों रुपए कव्वाली पर उड़ाते हुए, मैने आँखों से देखा है बेइंतहा फ़िज़ूल खर्च करते हुए।
   काश! मेरे माँ-बाप या मेरी कौम मेरी तालीम की फ़िक़्र मंद होती तो आज मै प्रधान मंत्री या मंत्री न सही, लेकिन मैं आज क्लेक्टर, एडीएम,कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर होता, बिना वोट पाये भी लाल बत्ती में होता, या कम से कम मै डॉक्टर,इंजिनियर,आर्किटेक्चर,या एक अच्छा बिजनेस मैन तो होता ही, लेकिन बचपन से मन में एक वहम घर कर गया है, "कि मियां तुम मुसलमान हो और मुसलमानो को यहाँ नौकरी आसानी से नही मिलती" लेकिन मैं ये तो भूल ही गया कि मेरे नबी ने तमाम जिंदगी तिजारत ही की और तालीम पर अहम् जोर दिया, फिर मै उनका उम्मती होकर नौकरी न मिलने की बात सोच कर तालीमात क्यों हासिल नही करता ?

  (नोट- दोस्तों ये तहरीर सिर्फ इस्लाही पोस्ट के लिए लिखी गयी है, रिक्शा चला कर पेट पालना या वेल्डिंग करना  दूध बेचना गैरेज के पाने उठाना या मजदूरी करना कोई गलत काम नही, लेकिन हम इसके लिए पैदा हुए है ये सोच कर तालीम हासिल न करना गलत है, खूब पढ़ाई करो, कि हर पद पर सिर्फ तुम दिखो, तुम्हे इज्जत से देखे, तुम पढ़े लिखे तबके में गिने जाओ, अंधविश्वास से दूर एक नयी जिंदगी जीकर मुल्क़ व क़ौम की ख़िदमत करे  और.....जहां प्रोपोगंडा नामक चीज ही न हो, आने वाली नस्लो को पढा लिखा कर हम अब तक के अपने इतिहास को बदल दे, यही एक ललक है कि ये कौम एक नया सवेरा देखे

रऊफ अहमद सिद्दीकी
संपादक
जनता की खोज
समाचार पत्र वे
मासिक पत्रिका

9286868383

Thursday, December 27, 2018

मिर्ज़ा ग़ालिब

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब‘ मर गया पर याद आता है,

आज संडे था न जाने क्या ख्याल आया दिल ने कहा चलो चचा ग़ालिब से मुलाकात की जाय
बल्लीमारन की गली कासीम जान में जाकर एक चाय वाले से पूछना पड़ा हवेली के बारे में

खैर हम उस हवेली के मुख्य द्वार तक
पहुँच गए जो खुला हुआ था. जहां १५० साल पहले उर्दू का
वह महान शायर रहा करता था.जहां १८६९ में ग़ालिब की मौत के बाद फ़ोन बूथ व अन्य
दुकाने खुल गईं थीं , लोगों ने अपना कब्जा कर लिया था.और आज
भी जिसके अधिकाँश हिस्से में यही सब काबिज है. 

सन २००० में भारतीय सरकार की
आँखें खुलीं और उन्होंने इस हवेली के कुछ हिस्से को कुछ कब्जाइयों से छुड़ा कर उस महान शायर की यादों के हवाले कर
दिया। आज उसी छोटे से हिस्से के बड़े से गेट पर चौकीदार  कम गाइड कम परिचर एक बुजुर्गवार बैठे हुए थे.

हमारे अन्दर घुसते ही वे पीछे
पीछे आ गए और जितना उन्हें उस हवेली के छोटे से हिस्से के बारे में मालूम था प्रेम
से बताने लगे.

उन्होंने ही बताया कि सरकार के इस
हिस्से को संग्रहालय के तौर पर हासिल करने के बाद भी कोई यहाँ नहीं आता था, वो तो कुछ वर्ष पहले गुलज़ार के यहाँ आने के बाद यह हवेली लोगों की निगाह
में आई और अब करीब १०० देसी , विदेशी यात्री यहाँ रोज ही आ
जाया करते हैं. 

हालाँकि उनकी इस बात पर उस समय
मेरा यकीन करना कठिन था, क्योंकि जहाँ पहुँचने में हमें इतनी परेशानी हुई थी. वहां
बिना किसी बोर्ड , दिशा निर्देश के कोई बाहरी व्यक्ति किस
प्रकार आ पाता होगा। और उस समय भी और जबतक हम वहां रहे
तब तक, हमारे अलावा वहां कोई भी नहीं आया था. पर शायद यह
बताने के पीछे उन सज्जन का एक और उद्देश्य था – वह शायद
बताना चाहते थे कि,  यूँ तो वह सरकार के कर्मचारी हैं
और निम्नतम तनख्वाह पर ग़ालिब की सेवा करते हैं पर आने जाने वाले यात्री ही कुछ
श्रद्धा भाव दे जाते हैं.

खैर हवेली में प्रवेश करते ही
सामने ग़ालिब की प्रतिमा दिखी जिसे गुलज़ार साहब ने वहां लगवाया है और साइड में
ग़ालिब अपनी बड़ी सी तस्वीर में से कहते जान पड़े –

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है! कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं.

वाकई उस बड़ी सी हवेली के उस छोटे
से हिस्से में कुछ गिना चुना २-४ सामान ही पड़ा हुआ है।  वह फ़िराक़ और वह विसाल कहां,

वह शब-ओ- रोज़ -ओ-माह -ओ -साल कहाँ।

यहाँ तक कि उस बरामदे की छत को भी
अभी हाल में ही कबूतरों के आतंक से तंग आकर बनवाया गया है. कुछ दो चार बर्तन हैं।
 जो ग़ालिब के थे वे तो पिछले दिनों चोरी हो गए , अब उनकी नक़ल रख दी गई है।  कुछ दीवान हैं शायर के, एक चौपड़ , एक शतरंज, और
दीवारों पर शायर की कहानी कहती कुछ तस्वीरें। शायद बस यही रहे हों साथी उनके आखिरी दिनों में , और
शायद इसीलिए उन्होंने कहा –

चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों
के ख़ुतूत,

बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ
निकला ।

हालाँकि वहां उपस्थित उन सज्जन ने
बताया कि सरकार की तरफ से केस चल रहा है और उम्मीद है कि पूरी हवेली को हासिल करके
कायदे से ग़ालिब के हवाले किया जाएगा। क्योंकि ग़ालिब की अपनी सातों  संतानों
में से कोई जीवित नहीं रही अत: उस हवेली का कोई कानूनन वारिस अब नहीं है. लोगों ने
अनाधिकारिक तौर पर कब्जा किया हुआ है. हमने चाहा तो बहुत कि उसकी इस बात पर भरोसा
कर लें. तभी एक बोर्ड पर राल्फ़ रसल के ये शब्द दिखे –

“यदि ग़ालिब अंग्रेजी भाषा में लिखते, तो विश्व एवं इतिहास के महानतम कवि होते “

 मेरे मन में आया – यदि ग़ालिब भारत की जगह इंग्लैण्ड
में पैदा होते, तो वहां इनके नाम का पूरा एक शहर संरक्षित होता।
 भारत में उनके नाम की उनकी गली भी नहीं।

सरकार से तो उम्मीद क्या करनी एक
दरख्वास्त गुलज़ार साहब से ही करने का मन है, एक प्रतिमा हवेली
के अन्दर लगवाई, तो हवेली प्रकाश में आई,कम से कम एक बोर्ड और बल्लीमारान गली के बाहर लगवा दें तो वहां तक आने
वालों को भी कुछ सुविधा हो जाये.

हम उस हवेली से निकल आये उस गली
को पीछे छोड़ आये पर साथ रह गया चचा का यह शेर –

हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन 

खाक़ हो जायेंगे हम तुमको ख़बर
होते तक

Sunday, December 2, 2018

अगर दुआ से मसले हल होते तो,,

मेरे तब्लीगी मुस्लिम मित्रो,
दिल्ली में लाखों किसान जुटे, क्यों? जवाब साफ है किसानों के हक और इंसाफ के लिए।  ऐसे ही तमाम लोग मुल्क में जुटते हैं। गुजरात में दलितों, पाटीदारों ने हक के लिए जुट कर सरकार की नाक में दम कर दिया। भीमा कोरेगांव में दलितों की जुटान भी आपको याद होगी। अभी हाल में महाराष्ट्र में मराठों की एकजुटता ने आरक्षण की जंग जीत ली।
दूसरी तरफ बीते दिनों आप औरगाबाद में 30 लाख की तादाद में जुटे थे, अल्लाह से दुआ के ,जरिए मुसलमानों कि बहबूदी के लिए, आप यूपी में अभी जुटे हो सिर्फ दुआ के लिए। आप ऐसी तब्लीगों में जुटते हो दुआ, सिर्फ दुआ के लिए, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसे दुआओं से आपको क्या हासिल हुआ, ये आप समझ सकते हैं।
दोस्तो अगर दुआओं से सारे मसले हाल होते तो पैगम्बर सल को जंग नहीं लड़नी पड़ती। अगर  तबलीग और दुआ ही हर प्राब्लम की हल होती तो इस्लाम ने आपको जिद्दो जहद की अवधारणा से परिचित ना कराया होता।  जिद्दोजहद का मतलब संगठित संघर्ष होता है।  अगर दुआ ही आपके हर ख्वाब की ताबीर होती तो कुरआन में इकरा (शिक्षा) पर आयत नाजिल न हुई होती। आप अल्लाह से दुआ करते और आपकी सारी दिक्कत खत्म हो जाती। आप इस बात को नहीं समझते, लेकिन भीम राव अम्बेडकर ने इसे समझा और कुरान के शिक्षित बनों, संगठित हो, संघर्ष का नारा दे कर दलितों के बेकार कर दिया, जिसे आप देख ही रहे हैं।
आपको बता दें कि डेढ़ साल पहले औरंगाबाद में तबलीग के जलसे में 4 से 6 सौ करोड़ रुपए खर्च हो गए। अभी पश्चिमी यूपी के जलसे में  सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं। ज़रा सोचिए इस तरह के जलसों पर पिछले 20 सालों में खर्च तकरीबन 10 हजार करोड़ का आधा हिस्सा मॉर्डन एजुकेशन और टेक्निकल और मुस्लिम बच्चों के I.A.S और I.P.S की कोचिंग आदि पर खर्च होता तो आज मुस्लिम नौजवान कहां होता और मुस्लिम कौम कहां होती?
मेरा मानना है कि जब तब्लीगी जमाती हजरात गांव स्तर पर घूम घूम कर तबलीग करते हैं, मस्जिद-मस्जिद पहुंच कर इस्लाम का ज्ञान और दुआओं के महत्व का संदेश देते ही हैं तो ये जगह-जगह लाख से लेकर पैंतीस लाख की भीड़ जुटा कर अरबों रुपए की बरबादी की क्या तुक है। इसे जमावड़े को कम कर कुछ रकम बचा कर इकरा (शिक्षा) मूवमेंट को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन भाई लोग सिर्फ दुआ के बल पर दुनियां से आगे निकल जाने का ख्वाब दिखा कर मुसलमानों को बरगला रहे हैं। सोचिए तो ज़रा।
( कुछ भाई लोग मुझे गाली दें तो भी चलेगा, मगर एक बार इस पर सोंचें तो सही)

सोचना वाली बात सिर्फ इतनी है
कि जंगे ख़दक याद कीजिए जब कुफ्फारे मक्का ने मदीने पर चढ़ाई की तब नबी(स०) ने दुआ की जगह प्रक्टिकल करके दिखाया और उन्होंने खुद कुदाल लेकर खुदाई की और हम नआऊज़ूबिल्लाह नबी के प्रक्टिकल अमल को छोड़ कर दुआओ से सारे मसले हल करने की कोशिश कर रहें हैं

Wednesday, September 26, 2018

मां बाप को सोचना होगा

(1) आज काफी लड़कियो के माँ बाप अपनी बेटियो की शादी मे बहूत विलंब कर रहे है ।उनको अपने बराबरी के रिश्ते पसंद नही आते और जो बड़े घर पसंद आते है उनको लड़की पसंद नही आती, शादी की सही उम्र 22 से 25 तक है पर आज के माँ बाप ने और अच्छा करते करते  उम्र 30 से 36 कर दी है जिससे उनकी बेटियो की खूबसूरती भी कम होती जाती है और बड़े लड़के से शादी होने के उपरांत वो लड़का उस लड़की को वो प्यार नही दे पाता जिसकी  हकदार वो लड़की है। समाज मे 30% डिवोर्स की वजह परिवारों  द्वारा यही बताई जा रही है। आज उमर छोटी हो चुकी है पहले की तरह 100+ या 80+ नही होती, अब तो केवल 65+ तक जीने को मिल पायेगा इसी वजह से आज लड़के उमर से पहले ही बूढ़े नजर आते है,सर गंजा हो जाता है।
    (2) आज ज्यादातर लड़की वाले लड़के वालो को वापस हाँ /ना का जवाब नही दे रहे है, संभवत कुछ लोग मंन मे आपको बुरा भला बोलते होंगे आप अपनी लाड़ली का घर बसाने निकले है, किसी का अपमान करना अच्छा नही होता कृपया आप लड़के वालो से सम्मान जनक जरूर बात करे।
     (3) कुंडली जिन्होंने मिला के रिश्ते किये आज उनके भी रिश्ते टूटे है फिर आप लोग क्यो कुंडली का जिक्र कर के रिश्ता ठुकरा देते है इतिहास गवाह है हमारे पूर्वजो जो ने शायद कभी कुंडली नही मिलायी और सकुशल अपनी शादी की 75 वी सालगिरह तक मनाई, आप कुंडली को माध्यम बनाके बच्चों को घर मे बिठा के रखे है उमर बढ़ती जा रही है, आता जाता हर यार दोस्त रिश्तेदार सवाल कर जाता है, कब कर रहे हो शादी आपसे 10 वर्ष कम आयु के लोगो को 8 साल के बच्चे भी हो गए ओर आप 32-35 मे शादी करेंगे तो आपके बच्चों की शादी के वक्त आप अपने ही बच्चों के दादा दादी नजर आएंगे।
   (4) आप घर कैसा भी चयन करे लड़की का भाग्य उसके पैदा होने से पहले ही भगवान ने लिख दिया है, भाग्य मे सुख लिखे है तो अंधेरे घर मे भी रोशनी कर देगी दुख लिखे है तो पैसे वाले भी डूब जाते है।
    (5) अंतिम मे बस इतना ही कहना है कि अपने बच्चों की उम्र बर्बाद ना करे, गयी उम्र लौट कर नही आती दुसरो को देख कर अपने लिए वैसा रिश्ता देखना मूर्खता है आप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के दुख को समझिए रिश्ता वो करिये, जिस लड़के वालो मे लालच ना हो, लड़का संस्कारी हो, जो आपकी बेटी को प्यार करे, उसकी इज्जत करे, उम्र बहूत छोटी है आप इतने जमीन जायदाद देख कर क्या कर लेंगे कौन अपने साथ एक तिनका भी ले जा पाया है। बच्चों की बाकी उम्र उनके जीवन साथी के साथ जीने दीजिये समय बहुत बलवान है आज की लडकिया पढ़ी लिखी है वो अपने परिवार के साथ कुछ अच्छा तो कर ही सकती है।

Monday, September 17, 2018

भिखारियों की गिनती में आ चुके मुसलमान


सोशल मीडिया पर आठ सालों में कई अनुभव हुए हैं, उनमे एक अनुभव ये भी हुआ है कि इस प्लेटफॉर्म पर मौजूद मुसलमानो की बड़ी तादाद अभी भी एक महदूद दायरे में चक्कर काट रही है, तालीम की बात की जाये तो उन्हें मदरसों पर खतरा मंडराता नज़र आने लगता है, कईयों को दुनियावी तालीम बदकारी और मज़हब से दूर ले जाने वाली बुराई लगती है, उस पर अगर मुस्लिम औरतों की तालीम की बात की जाये तो हज़ार तर्कों के साथ ना नुकुर और अगर मगर वालों की भीड़ आ खड़ी होती है !

इतिहास में पीछे जाकर देखे तो पता चलता है कि मुसलमानों ने इस्‍लाम और इस्‍लामी नज़रिये का गहरा मुताला किया, वो तालीम के बारे में बिल्‍कुल साफ नज़रिया रखते थे, तालीम ही उनके नज़रियें को विस्‍तार देती थी, जिससे उनकी अक़ली (बौद्धिक) कुव्‍वत बढ़ जाती थी, और उन्‍हे दूसरों का टीचर (अध्‍यापक) बनाती थी ! इसका नतीजा ये हुआ कि वो अपने वक़्त की सुपरपावर बन गऐ जिन्‍होंने ने साइंस और तालीम के क्षेत्र में बहुत बडी़ तादाद में योगदान दिया !

मगर आज का मुसलमान तालीम से दूर होता जा रहा है, उसकी प्राथमिकताओं में तालीम शायद सबसे निचले पायदान पर है, एक बार कहीं पढ़ा था कि "मुसलमानों को कभी कोई युनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज माँगते हुए नहीं देखा, कभी न ही वो अपने इलाक़े में अस्पताल के लिए आंदोलन चलाते हैं और न ही बिजली पानी के लिए, उन्हें चाहिए तो बस एक चीज़. लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अज़ान देने की इजाज़त, ये इजाज़त छीन लेने भर की खबर पर सड़कों पर निकल आते हैं !!"

मैंने एक बार मौलाना डॉ. कल्बे सादिक साहब के बयान वाली एक पोस्ट शेयर की थी जिसमें उन्होंने  कहा कि "मस्जिदों और इमामबाड़ों में ग्रेनाइट चमकाने से कौम की तरक्की नहीं होने वाली। इससे बेहतर है कि स्कूल और कॉलेजों को बढ़ावा दिया जाए !" इस पोस्ट पर भी मुसलमानो ने जमकर लठैती की थी, उनका इस बयान पर नजरिया एक तरफ़ा था, कल्बे सादिक साहब का कहने का मतलब यही था कि भले ही मस्जिदों और इमामबाड़ों को ग्रेनाइट से चमकाईये मगर साथ ही तालीम को प्राथमिकता के तौर पर लिया जाना चाहिए, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के लिए तालीम ही एक ज़रिया है ! स्कूल-कॉलेज भी बनाएं ताकि कौम के साथ सबको इसका लाभ पहुंचे,कौम तरक्की करे और अच्छा समाज बन सके !

मगर अभी भी हमारी प्राथमिकताएं नहीं बदली हैं, ना ही सोच ना ही नज़रिया, ये एक कड़वी सच्चाई है, कल परसों की ही बात है, जैकी चेन को हज कराने के एक फोटो को जानबूझ कर शेयर किया था, और उस फोटो पर मुसलमानो की प्रतिक्रिया सामने रखी थी, और साथ ही एक पोस्ट भारतीय मूल की मुस्लिम औरत हलीमा याकूब के सिंगापुर की राष्ट्रपति बनने की खबर शेयर की थी, मगर प्रतिक्रिया बहुत ही ढंडी थी, जैकी चेन के उस फोटो की दलील इसलिए दे रहा हूँ कि ये और इस जैसी बहुत सी पोस्ट्स , जैसे किसी बड़े गैर मुस्लिम सेलेब्रिटी के इस्लाम क़ुबूल कर लेने की झूठी खबर, चाँद से किसी मस्जिद को देखकर इस्लाम क़ुबूल कर लेने की खबर, और इन झूठी ख़बरों पर तारीफ करते टूट पड़ना, उन्हें हज़ारों की तादाद में शेयर करना, एक बड़ी मिसाल है हमारी प्राथमिकताओं की !

कभी जब तालीम के क्षेत्र में पिछड़ने की बात महसूस होती है तो इस्लामी इतिहास की किताबें खोल कर अतीत की उपलब्धियों का बखान करने लगते हैं, इससे क्या साबित होता है ? यही न कि आपका अतीत सुनहरा था, आपने उसका क्या हाल किया ? ये बताइये कि आपका वर्तमान क्या है, और मुस्तक़बिल के लिए तालीम-ओ-तरक़्क़ी के लिए आप क्या जद्दो जहद कर रहे हो ?

इतिहास की पोटली खोल कर रखने की मनाही नहीं है, नयी नस्ल के लिए ये ज़रूरी भी है, मगर साथ ही वर्तमान में नयी इबारत लिखने की कोशिशें भी जारी रखना चाहिए, तभी मुस्तक़बिल रोशन हो सकेगा, सिर्फ इतिहास की पोटली ही हमें निहाल नहीं करने वाली !

इस बात पर शायर बिरजीस राशिद आरफी साहब का ये शेर याद आ जाता है :-

वो अपनी मुफ़लिसी जब भी छुपाने लगता है !
.
तो बाप - दादा के क़िस्से सुनाने लगता है  !!

जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार बताया गया है कि देश के कुल 3.7 लाख भिखारियों में से हर चौथा भिखारी मुसलमान है, यानी प्रतिशत के हिसाब से सबसे बड़ा प्रतिशत मुसलमान भिखारियों का हुआ !

मुल्क में वोटर लिस्ट में मौजूद भीड़ से नहीं बल्कि पढ़ लिख कर ओहदों पर पहुँचने वाली भीड़ के तौर पर गिनती बढ़ाइये

Sunday, September 16, 2018

खुदा का बनाया बहतरीन व अद्धभुत शाहकार है इंसान


*जबरदस्त फेफड़े*
हमारे फेफड़े हर दिन 20 लाख लीटर हवा को फिल्टर करते हैं. हमें इस बात की भनक भी नहीं लगती. फेफड़ों को अगर खींचा जाए तो यह टेनिस कोर्ट के एक हिस्से को ढंक देंगे.

*ऐसी और कोई फैक्ट्री नहीं*
हमारा शरीर हर सेकंड 2.5 करोड़ नई कोशिकाएं बनाता है. साथ ही, हर दिन 200 अरब से ज्यादा रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है. हर वक्त शरीर में 2500 अरब रक्त कोशिकाएं मौजूद होती हैं. एक बूंद खून में 25 करोड़ कोशिकाएं होती हैं.

*लाखों किलोमीटर की यात्रा*
इंसान का खून हर दिन शरीर में 1,92,000 किलोमीटर का सफर करता है. हमारे शरीर में औसतन 5.6 लीटर खून होता है जो हर 20 सेकेंड में एक बार पूरे शरीर में चक्कर काट लेता है.

*धड़कन, धड़कन*
एक स्वस्थ इंसान का हृदय हर दिन 1,00,000 बार धड़कता है. साल भर में यह 3 करोड़ से ज्यादा बार धड़क चुका होता है. दिल का पम्पिंग प्रेशर इतना तेज होता है कि वह खून को 30 फुट ऊपर उछाल सकता है.
*सारे कैमरे और दूरबीनें फेल*
इंसान की आंख एक करोड़ रंगों में बारीक से बारीक अंतर पहचान सकती है. फिलहाल दुनिया में ऐसी कोई मशीन नहीं है जो इसका मुकाबला कर सके.

*नाक में एंयर कंडीशनर*
हमारी नाक में प्राकृतिक एयर कंडीशनर होता है. यह गर्म हवा को ठंडा और ठंडी हवा को गर्म कर फेफड़ों तक पहुंचाता है.

*400 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार*
तंत्रिका तंत्र 400 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से शरीर के बाकी हिस्सों तक जरूरी निर्देश पहुंचाता है. इंसानी मस्तिष्क में 100 अरब से ज्यादा तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं.

*जबरदस्त मिश्रण*
शरीर में 70 फीसदी पानी होता है. इसके अलावा बड़ी मात्रा में कार्बन, जिंक, कोबाल्ट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट, निकिल और सिलिकॉन होता है.

*बेजोड़छींक छींकतेसमय बाहर निकले वाली हवा की रफ्तार 166 से 300 किलोमीटर प्रतिघंटा हो सकती है. आंखें खोलकर छींक मारना नामुमकिन है.

*बैक्टीरिया का गोदाम*
इंसान के वजन का 10 फीसदी हिस्सा, शरीर में मौजूद बैक्टीरिया की वजह से होता है. एक वर्ग इंच त्वचा में 3.2 करोड़ बैक्टीरिया होते है
*ईएनटी की विचित्र दुनिया*
आंखें बचपन में ही पूरी तरह विकसित हो जाती हैं. बाद में उनमें कोई विकास नहीं होता. वहीं नाक और कान पूरी जिंदगी विकसित होते रहते हैं. कान लाखों आवाजों में अंतर पहचान सकते हैं. कान 1,000 से 50,000 हर्ट्ज के बीच की ध्वनि तरंगे सुनते हैं.

*दांत संभाल के*
इंसान के दांत चट्टान की तरह मजबूत होते हैं. लेकिन शरीर के दूसरे हिस्से अपनी मरम्मत खुद कर लेते हैं, वहीं दांत बीमार होने पर खुद को दुरुस्त नहीं कर पाते.

*मुंह में नमी*
इंसान के मुंह में हर दिन 1.7 लीटर लार बनती है. लार खाने को पचाने के साथ ही जीभ में मौजूद 10,000 से ज्यादा स्वाद ग्रंथियों को नम बनाए रखती है.

*झपकती पलकें*
वैज्ञानिकों को लगता है कि पलकें आंखों से पसीना बाहर निकालने और उनमें नमी बनाए रखने के लिए झपकती है. महिलाएं पुरुषों की तुलना में दोगुनी बार पलके झपकती हैं.

*नाखून भी कमाल के*
अंगूठे का नाखून सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ता है. वहीं मध्यमा या मिडिल फिंगर का नाखून सबसे तेजी से बढ़ता है.

*तेज रफ्तार दाढ़ी*
पुरुषों में दाढ़ी के बाल सबसे तेजी से बढ़ते हैं. अगर कोई शख्स पूरी जिंदगी शेविंग न करे तो दाढ़ी 30 फुट लंबी हो सकती है.

*खाने का अंबार*
एक इंसान आम तौर पर जिंदगी के पांच साल खाना खाने में गुजार देता है. हम ताउम्र अपने वजन से 7,000 गुना ज्यादा भोजन खा चुके होते हैं.

*बाल गिरने से परेशान*
एक स्वस्थ इंसान के सिर से हर दिन 80 बाल झड़ते हैं.

*सपनों की दुनिया*
इंसान दुनिया में आने से पहले ही यानी मां के गर्भ में ही सपने देखना शुरू कर देता है. बच्चे का विकास वसंत में तेजी से होता है.
*नींद का महत्व*
नींद के दौरान इंसान की ऊर्जा जलती है. दिमाग अहम सूचनाओं को स्टोर करता है. शरीर को आराम मिलता है और रिपेयरिंग का काम भी होता है. नींद के ही दौरान शारीरिक विकास के लिए जिम्मेदार हार्मोन्स निकलते हैं.