रऊफ अहमद सिददीकी की दुनिया में आपका स्वागत है

Saturday, August 4, 2018

अब भा ज पा को सिर्फ हिंदुत्व का सहारा

अभी तक भा ज पा  हर बार चुनाव जीतने के तीन ही संकल्प  लेकर वोटरों को आकर्षित करती रही है  - राम मंदिर,  समान आचार संहिता और धारा 370 .अब दूसरी बार भा ज पा की सरकार बनी है और अपने शासन के चार साल पूरे भी  कर चुकी है लेकिन ये संकल्प  न कभी पूरे हुए  और न हो  सकते हैं ।जनता की नज़र में ये मुद्दे अब अपना महत्व खो चुके हैं ।न नौ मन तेल हो पा रहा है और न राधा के नाचने की कोई संभावना है ।भा ज पा हमेशा हिन्दू और हिन्दुत्व के नाम पर वोट माँगती आई है ।कार्य प्रदर्शन , जन कल्याण और सफल प्रशासन के मुद्दे कांग्रेस के हैं अतः भा ज पा इनकी बात ही नहीं करती ।

चार साल में बहुत पानी यमुना में बह चुका ।  2019 का चुनाव करीब आ रहा है ।फिर चार राज्यों के विधान सभा चुनाव तो एकदम सिर पर आ पहुँचे ।भा ज पा किन मुद्दों पर वोट माँगे  ? नोट बन्दी पर ? जी एस टी पर ? किसानों की बदहाली पर ? पेट्रोल की कीमतों पर ? देश की पूँजी के पलायन पर ? तमाम कारण ऐसे पैदा हो गये हैं जिनके लिये अब नये बहाने काम नहीं आ रहे हैं ।पलटवार की भी कोई सीमा होती है ।कहाँ तक किये जाएँ  ? भा ज पा का प्रचार तंत्र उसकी गिरती हुई साख को बचाने में जी जान से लगा हुआ है पर बात बन नहीं पा रही है ।

भा ज पा के पास ले दे कर अब  हिन्दुत्व का ही सहारा बचा  है -

एक भरोसो , एक बल,  एक आस बिस्वास ।

वही हिन्दुत्व उसका तारणहार है ।वही संकट मोचन है ।भा ज पा अपने पारंपरिक हिन्दू वोटरों को एक नये मोहपाश में बाँध रही है ।आसाम में एन सी अार के मुताबिक चालीस लाख लोग वहाँ के नागरिकों में शामिल नहीं पाये गये हैं ।इनमें से अधिकांश बंगलादेशी घुसपैठिये मुसलमान हैं ।अब इन सबको खदेड़ कर भगा दिया जायेगा ।अब पूरे देश में असली नागरिकों का पंजीकरण कराया जाएगा ।तब इतने ही मुसलमान और पकड़ में आएँगे ।इन सब को यहाँ से बोरिया बिस्तर समेट कर जाना होगा ।हिन्दुओं के संतोष के लिये यह एक राम बाण है ।बहुत दिनों से उनको समझाया जा रहा है कि मुसलमान चार शादियाँ करते हैं ।आठ बच्चे पैदा करते हैं ।इनको हटाया नहीं गया तो कुछ दिनों में ये बहुमत में आ जायेंगे  ।ऊपर से ये बंगलादेशी घुस पैठिये मुँह उठाए चले आए हैं ।इनको यहाँ रहने का कोई हक नहीं है ।भारत को मुस्लिम मुक्त करना है ।

आव्रजन  की समस्या सभी देशों में है ।लोग किसी न किसी बहाने विकसित देशों में प्रवेश कर जाते हैं फिर जैसे तैसे ग्रीन कार्ड बनवा कर वहाँ की नागरिकता हासिल कर लेते हैं ।अमेरिका भी अवैध रूप से वहाँ रह रहे भारतीयों को वापस भेजने की बात करता है किन्तु यह हो नहीं पाता ।मैक्सिको से तो वहाँ इतने लोग चले आते हैं कि अब ट्रंप मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने जा रहे हैं ।हम भी कह रहे हैं कि इन बंगला देशियों को वापस भेज देंगे किन्तु क्या यह इतना आसान है  ? जो सैंतालिस साल से यहाँ बसे हुए हैं , जो इतने साल से टैक्स दे रहे हैं , वोट डाल रहे हैं उनको वापस भेजना संभव नहीं ।राजीव गाँधी ने  1985 में आसाम  समझौता किया था । तब जो 1971 की समय सीमा तय की थी उस पर तब के तभी अमल किया जा सकता था ।किन्तु तीन करोड़  व्यक्तियों की नागरिकता प्रमाणित करना एक बेहद पेचीदा काम था जो समय से पूरा नहीं हो पाया और तैंतीस साल निकल गये । हो तो अब भी नहीं पाया है पर सरकार को एक मुद्दा मिल गया ।सोचने वाली बात है कि आज के दिन सन 71 के आव्रजन की सीमा तय करना सर्वथा अनुचित और अमानवीय है ।यह सीमा पाँच से सात साल की होनी चाहिये थी  ।जो बहुत पहले से बसे हुए हैं उनको ग्रीन कार्ड जैसी नागरिकता देने की बात सोची जा सकती है ।या कोई और रास्ता निकाला जा सकता है पर देश निकाला  दे देना इस  समस्या का समाधान नहीं।इस तरह तो हम समस्या के समाधान के नाम पर तमाम नयी समस्याओं को आमंत्रित कर लेंगे ।

इतनी बड़ी संख्या में लोग यहाँ हमला करने या लूट पाट करने नहीं आए हैं ।सब के सब रोजगार और जीवन यापन के साधनों की तलाश में ही आते रहे हैं ।इनका आना वैसे ही लेना चाहिये  जैसे भारतीय नागरिक अमेरिका या कैनेडा में अवैध तरीके से घुस जाते हैं ।वहाँ भी इसका घोर विरोध होता है पर झगड़ा मानवीय स्तर का है ।हमारे देश में  इसे विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक मसला माना जा रहा है ।इसे सांप्रदायिक  रंग देकर उसका राजनैतिक लाभ उठाने से सरकार को रोका नहीं जा सकता है ।

आसाम के चुनाव में  प्रधान मंत्री ने यह तुरुप चाल चली थी कि हम बंगलादेशी घुसपैठियों को यहाँ से निकाल बाहर करेंगे ।अब चार राज्यों के चुनाव में भी हिन्दू वोटरों का इस वायदे पर भरोसा बना रहा तो इसका बहुत बड़ा लाभ सत्ता पक्ष को मिलेगा ।जो भी इसका विरोध करेगा वह देश द्रोही कहलाएगा ।समझने वाले तो समझ रहे हैं कि यह वैसा ही अधूरा संकल्प है जो  पूरा तो नहीं होगा किन्तु वोट दिलाने वाली कामधेनु बना रहेगा  ।नागरिकों की पहचान का काम अभी भी मुकम्मल तौर पर नहीं हो पाया है पर चुनाव जिताने के लिये संजीवनी ऊर्जा रखता है  राम मंदिर कहाँ बन पाया   ? समान आचार संहिता कहाँ लागू हुई ? धारा 370कहाँ हटी   ? पर वोट तो वायदों पर ही मिलता  है।पिछले वायदे तो पन्द्रह लाख के वायदों की तरह खोटे निकल गये ।इस नये वायदे में नयी चमक दमक है ।नया भरोसा है ।सरकार को इसकी सख्त जरूरत है ।सरकार का लक्ष्य बस  इतना ही है । जैसे भी संभव हो ,  सत्ता मिले और मिलने के बाद किसी भी कीमत पर बनी रहे ।फिर और क्या चाहिये  ?

Friday, July 27, 2018

परदे की आड़ में तालीम से दूर

परेशान है आयशा (रज़ि ) की बेटियां ,फातिमा(रज़ि )  की बहने

मुसलमानो की आधी ताक़त उस वक़्त ख़त्म हो गयी जब साज़िशन औरतो को परदे परहेज़ की आड़ में न सिर्फ तालीम से दूर कर दिया गया बल्कि  तरबियत से बिलकुल अलग कर के सिर्फ घरो की चाहरदीवारी में रख दिया गया  एक पूरी साज़िश के तहत इस्लाम का रूप रंग बदल कर उसको इतना बेरंग बना दिया गया कि आज मुसलमान औरते गुमराहियों के अंधेरो में गुम होती जा रही है. जिस मज़हब ने दुनिया में औरतो को उसके हक़ दिलाने की शुरुआत की  उसी को मानने वालो में औरतो के हालात बहुत बुरे है।  इसका नतीजा ये है की कुछ औरते बग़ावत कर के बेहयाई को आधुनिकता के रूप में अपनाने लगी है जब की एक दूसरा ग्रुप खुद को बेहद मज़हबी बनाने की कोशिश में न सिर्फ दुनिया और समाज से दूर कर के दकियानूस हो गया जिसकी वजह से  अपनी औलाद और परिवार की भी सही तरबियत नहीं कर पाती। आज मुस्लिम समाज की हकीकत ये है की या तो आधुनिकता के नाम पर बेहयाई या फिर मज़हब के नाम दकियानूस बने हुए ।  जबकि रसूलल्लाह (सल्ल ) ने बीच के रास्ते को बेहतरीन बताया है। हम उस मां हज़रत आयशा की बेटियां है जो अपनी ही माँ की तरबियत से महरूम हो गयी है जो रसूलल्लाह की तालीम और तरबियत को तमाम औरतो तक पहुँचाती थी।  जब तक इस आधी ताक़त को इकठ्ठा नहीं किया जायेगा तब तक इस क़ौम को अंधेरो में ही भटकना पड़ेगा,,,,,,,,,,,,जारी

Saturday, July 21, 2018

हलाला

”हलाला” क्या है?
इसको ज़रूर समझे।
मुस्लिम समुदाय के हलाला के मसाएल को जिस गलत तरह से समाज मे रखा जा रहा है वो बेहद अफ़सोस जनक है। क्योंकि 1% ही मामले हलाला के देखने को मिलेंगे।मुझे नही लगता कि समाज मे बेरोज़गारी,शिक्षा से बढ़ा कोई और मुद्दा है।
फिर भी हलाला क्या है,,इसको सुनिए

क़ुर’आन में अल्लाह ने कहा है कि अगर शौहर अपनी बीवी को तीसरी-तलाक़ दे दे तो फिर वो औरत अपने शौहर के लिए हलाल नहीं रहती, फिर वो औरत अपनी इद्दत का वक़्त गुज़ारने के बाद अपनी इच्छा अनुसार किसी दूसरे आदमी से शादी(निकाह) कर ले फिर इत्तिफाक़ से(याद रहे जान बूझ कर नही) उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शोहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो वो औरत चाहे तो( अपनी मर्ज़ी से) पहले मर्द से(यानि अपने पहले पति से) निकाह कर के उसके लिए जायेज़ या हलाल हो सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैंI

हम शर’ई हुक्म हलाला की ताईद (समर्थन) करते हैं क्योंकि “हलाला” तलाक को रोकने का एक ऐसा बैरियर है जिसे सोचकर ही पुरुष “तलाक” के बारे में सोचना बंद कर देता है।(यहाँ कुछ दोस्तो का कहना है गलती शौहर करे तो उसे औरत क्यूँ भोगे उन्हें बता दूँ कि दूसरी शादी औरत अपनी मर्ज़ी से करती है ज़िन्दगी की नई शुरुआत करने अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरे शौहर के साथ बिताने के लिए) यह व्यवस्था इसलिए है कि कोई भी ऐसी सख्त व्यवस्था से डर कर अपनी बीवी को जल्दीबाजी में तलाक ना दे, अगर हलाला का कानून नहीं बनाया जाता तो शौहर अपनी बीवी को तलाक देकर फिर से शादी की घटनाओं की बाढ़ आ जाती और तलाक महज़ एक मजाक बन कर रह जाता।

हलाला मुख्य रूप से महिलाओं की इच्छा के उपर निर्भर एक स्वतः प्रक्रिया है जिसमे वह तलाक के बाद अपनी मर्जी से खुशी खुशी और बिना किसी पूर्व योजना (हृदय में हलाला का ख्याल तक ना हो) के अन्य पुरुष से सामान्य विवाह कर लेती है और फिर दूसरे विवाह में भी ऐसी परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं कि यहाँ भी निकाह, तलाक की उसी प्रक्रिया के अनुसार टूट जाता है तब ही वह इद्दत की अवधि के बाद पूर्व पति के साथ पुनः निकाह कर सकती है वह भी उसकी अपनी खुशी और मर्जी से।


गौरतलब रहे कि यह पूरी घटना इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है जान बूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई ह!

Tuesday, July 17, 2018

अर एस एस

संघ प्रमुख बनाम प्रणब दा

मेरी तरह बहुत लोगों ने बड़ी उत्सुकता से संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत और भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुना ।दोनों ही भाषणों में जिस प्रत्यक्ष या परोक्ष आक्रामकता की अपेक्षा थी वह बहुत बारीकी से तलाशने पर भी नहीं मिली ।टक्कर तो बराबर की थी ।एक तरफ़ आर एस एस के प्रमुख जो इस समय देश की सर्वोच्च सत्ता के प्रतिनिधि हैं और दूसरी तरफ़ विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठतम और सम्मानित नेता  श्री प्रणब मुखर्जी।यह वैचारिक वैषम्य  एक घमासान युद्ध का रूप भी ले  सकता था  । इसी लिये जिज्ञासा का स्तर बहुत ऊँचा था ।

चार साल से हम आर एस एस के लोगों को जिस तरह की असभ्य भाषा और अनर्गल दुष्प्रचार के माध्यम से पहचानते आए हैं उस से  संघ प्रमुख को सर्वथा विपरीत रूप में पाया ।भा ज पा के नेताओं  और  खास तौर पर मोदी जी के एक ही जैसे रटे रटाए भाषण सुनतेसुनते कान पक चुके हैं - सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ,  गाँधी और नेहरू ने देश का बँटवारा करा दिया,  पटेल को प्रधान मंत्री नहीं बनाया , इमर्जेन्सी लगा दी,  वंशवाद चलता है  ,  मुस्लिम तुष्टीकरण होता है वगैरह वगैरह ।पर संघ प्रमुख के उस भाषण में ऐसी कोई बयान बाजी का अनुपस्थित होना  सर्वथा  अप्रत्याशित था ।संघ प्रमुख और प्रधान मंत्री के विचारों और आचरण में इतना भारी अन्तर क्यों है  ? दोनों में से कौन आर एस एस का सही प्रतिनिधि है  ? यह एक अहम सवाल हैजिसका जवाब जनता को मिलना चाहिये ।

आर एस एस के पास  तीन मुद्दे ही प्रमुख हैं - राम मंदिर , धारा  370 और कामन सिविल कोड ।पर  संघ प्रमुख ने इनका ज़िक्र तक नहीं किया ।न उन्होंने देश को मुस्लिम मुक्त करने की घोषणा की और न हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात की जबकि भाषण का विषय राष्ट्रीयता ही था ।।भा ज पा के नेता जिस तरह से मुसलमानों और दलितों की हत्या का अनुमोदन करते हैं वह भी अनुपस्थित था ।न गाय,  गोबर और गोमूत्र का महिमामंडन था और न साम्प्रदायिक नफ़रत का ज़हर कहीं देखने को मिला ।तो फिर एक सवाल मन में उठता है कि क्या आर एस एस की सोच का दायरा हिंसा , असहिष्णुता और असभ्यता के बाहर भी कभी  हो पाना संभव  है  ? क्या संघ प्रमुख ऐसी ही बातें संघ के सदस्यों से नहीं करते हैं  ? फिर वह लोग संघ प्रमुख की अवहेलना क्या जान बूझ कर करते हैं   ?

श्री मोहन भागवत  के भाषण में भले ही प्रणब दा के भाषण जैसी शास्त्रीयता , तथ्यात्मक वैविध्य और व्यापकता नहीं थी किन्तु जो आडम्बरहीन सरलता थी उसने मन पर गहरी छाप छोड़ी ।क्या वजह है कि आर एस एस के लोग संघ प्रमुख जैसी भाषा का प्रयोग नहीं करते  ? उनकी तरह विविधता में अंतर्निहित एकता को नहीं देख पाते  ? दूसरे के दृष्टिकोण  को समझने का प्रयत्न नहीं करते  ? पूरे देश को एक परिवार के रूप में नहीं देख पाते  ?  लोक तंत्र का सम्मान नहीं कर पाते  ? देश को उस राष्ट्र के रूप में नहीं स्वीकार करते जिसमें सब समान रूप से भागीदार हैं ? 

आर एस एस में यह घोर अन्तर्विरोध एक अबूझ पहेली बना हुआ है ।उसे विश्व की सबसे  बड़ी संस्था होने का गौरव कोई  सैद्धान्तिक सोच रखे बिना  हासिल हो गया हो , यह संभव नहीं है ।संघ के कार्यकर्ताओं का अनुशासन और सेवा भाव सदैव प्रशंसित होता है ।संघ के लोग देश के सभी प्रशासनिक और संवैधानिक पदों पर आसीन हैं ।फिर उनके माध्यम से संघ प्रमुख के भाषण वाली सोच का प्रसार आज तक क्यों नहीं हुआ   ? जिस प्रकार की  सत्ता उसके हाथ में है और जिस प्रकार की सोच संघ प्रमुख की दिखाई दी इन दोनों का समन्वय हो जाता तो देश में सर्वत्र शान्ति और सद्भावना का प्रसार नजर आता ।क्या कारण है कि गले में  भगवा अँगौछा डाल कर कैसा भी अपराध करने की छूट हासिल हो जाती है  ?क्या कारण है कि मुसलमान की हत्या करने वाले की शोभा यात्रा निकाली जाती है  ? क्या कारण है कि बलात्कारियों के समर्थन में भा ज पा के नेता सड़क पर आ जाते हैं  ? क्या कारण है कि घोड़े पर बैठने का साहस करने  वाले दलित की हत्या कर दी जाती है  ? ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके विषय में संघ के विचारकों को आत्म मंथन करना चाहिये ।

उधर कांग्रेसियों को श्री प्रणब मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में जाने पर अकारण ही चिन्ता हो रही थी ।उन्होंने अपने भाषण में राष्ट्रीयता के सभी आयामों का बहुत गुरु गंभीर विश्लेषण किया ।लोग चाहते थे कि वह संघ के खेमे
में जाकर उनकी नीतियों की निन्दा करें, उनको अकल सिखाएँ । किन्तु उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं किया ।केवल कांग्रेस के आदर्शों  के आलोक में लोकतंत्र की महत्ता को स्थापित किया ।जिस तरह से संघ प्रमुख ने कोई ओछी बात कहकर कांग्रेस पर कोई प्रहार नहीं किया वैसे ही श्री प्रणब मुखर्जी ने कोई भी निन्दात्मक टिप्पणी  नहीं की ।दोनों ने  उसी गरिमा का निर्वाह किया जैसी उनसे अपेक्षित थी । बहरहाल इस समारोह में टक्कर तो दो दिग्गजों में थी लेकिन मैच फ़्रेन्ड्ली रहा  और अन्त में ड्रा भी हो गया  ।न तो एक दूसरे की प्रशंसा की गयी और न निन्दा ।संघ संघ रहा और प्रणब प्रणब ।

Monday, May 7, 2018

जैसे पेड़ खजूर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ ?

आजकल एक अजीब किस्म की दबंगई देखने में आ रही है ।एक दल विशेष बहुमत के साथ सत्ता में आ गया है ।इससे इस दल के अदना से अदना नेता को भी यह गुमान हो गया है कि वह ज्ञान के मामले में किसी अरस्तू या सुकरात से कम नहीं है।कोई कहता है कि बाल विवाह करने से लव जिहाद नहीं होगा,  कोई कहता है कि मैगी खाने  से बलात्कार हो जाता है,  कोई कहता है कि महाभारत में इंटरनेट मौजूद था,  कोई कहता है कि हर हिन्दू को आठ बच्चे पैदा करने चाहिये ।बात इनकी बौद्धिक विकलांगता  तक सीमित नहीं है ।ये जब चाहें कानून और व्यवस्था को भी  अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते हैं ।ये एयर लाइन्स के उच्च पदाधिकारी की पिटाई लगा सकते हैं ।ट्रेन को अपने आदेश पर चलने के लिये बाध्य कर सकते हैं ।प्रशासनिक  अधिकारी को थप्पड़ मार सकते हैं ।पुलिस कर्मी तो आए दिन इन नेताओं से पिटा ही करते हैं ।कदम - कदम पर इनका दंभ जनता को लाल - लाल आँखें दिखाता हुआ  यह सवाल पूछता है  - जानते नहीं मैं कौन हूँ  ?

हुज़ूर माई बाप,  हम जानते हैं कि आप सरकार हैं ।पर शायद आप खुद नहीं जानते कि आप सरकार हैं ।आप यह तो   जानते हैं कि एक अकेले नेता के धुआँधार भाषण पूरी पार्टी को लोक सभा के अलावा देश के 20 राज्यों पर कब्ज़ा दिला सकते हैं पर आप यह नहीं जानते कि कब्ज़ा पाने के बाद उक्त पार्टी पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी भी आ जाती है ।वह सरकार किस काम की जो केवल अपने और अपने चहेतों के ठाट बाट पर देश की सारी संपत्ति स्वाहा कर दे । जनता की अपेक्षाओं की तरफ़ से अपनी आँखें पूरी तरह से बन्द किये रहे। सुशासन के नाम पर  भाषण ही  भाषण पेलती रहे ।

कबीर दास ने लिखा था -

बड़ा हुआ तो क्या हुआ,  जैसे पेड़ खजूर ।
  पंथी को छाया नहीं ,  फल लागे अति दूर ॥

खजूर का पेड़ होने को तो बहुत बड़ा है पर उसकी उपयोगिता क्या है ? पथिक उसकी छाया में विश्राम नहीं  कर सकता है और उसका फल इतनी दूर होता है कि कोई उसको तोड़ कर अपनी भूख नहीं मिटा सकता ।यानी आपकी सार्थकता सरकार बना लेने में नहीं उसका लाभ जनता तक पहुँचा देने में है ।आपको पता भी है कि जनता क्या चाहती है  ?

धर्म के नाम पर मारकाट , बलात्कार और दंगा फ़साद आपके कुछ उपद्रवी समर्थकों  को हिंसक आनन्द  भले ही प्रदान करता हो पर आम भारतीय हिन्दू या मुसलमान  सौहार्द्र - प्रिय है ।वह सदियों से धार्मिक और सामाजिक विभिन्नताओं  के प्रति सहिष्णु रहा  है ।सरकार से उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा है कि वह ऐसा  शान्ति पूर्ण वातावरण प्रदान करे  जिसमें आम जनता सुरक्षित महसूस करे । उसके जीवन में स्थायित्व हो ।वह अपने वर्तमान और भविष्य की खुशहाली को अंजाम देने के लिये उद्यम कर सके ।

उद्यम प्रदान करना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।मौजूदा सरकार सालाना तीन करोड़ रोज़गारों का सृजन नहीं कर सकी तो कोई बात नहीं ।लेकिन आम नागरिक चिन्तित इस बात से होता है कि बिना किसी पूर्व सूचना या तैयारी के यह सरकार अकस्मात कोई भी नया कानून बनाती  है और धड़ाम से  लाखों लोग सड़क पर आ जाते हैं ।नोट बन्दी और जी एस टी ने  रोजगार के क्षेत्र में जो तबाही मचाई थी वह  किसी सुनामी से कम नहीं थी । और भी ताबड़तोड़ लिये गये  छोटे-  छोटे फ़ैसले इस तबाही के  लिये जिम्मेदार रहे हैं ।गो वध पर प्रतिबन्ध लगा , लाखों लोग बेरोज़गार हो गये ।शराब बन्दी आई , लाखों लोग बेरोज़गार हो गये ।शिक्षा नीति बदली , लाखों शिक्षा मित्र बेरोजगार हो गये , एन सी ई आर टी की पुस्तकें अनिवार्य कर दी गयीं , लाखों निजी प्रकाशनों से जुड़े हुए लोग बेरोज़गार हो गये ।इस आए दिन के बेरोज़गारी  बढ़ाओ अभियान का शिकार हो चुके लोग कैसे यह मान लें वह  खुशहाल हैं  ? या उनके खुशहाल हो जाने  की कहीं कोई संभावना है ।

खुशहाल रहने के लिये धन चाहिये ।आवश्यक सुविधाएँ चाहिये ।देश की 80%  जनता कृषि और छोटे उद्योगों पर निर्भर थी ।उस साधारण जनता की आर्थिक हैसियत पर बढ़ती हुई महँगाई और टैक्सों की लूट ने डाका डाला है ।
सरकार की अनुभव हीनता के परिणाम स्वरूप देश की 73%  पूँजी केवल 1% बड़े उद्योग पतियों की तिजोरी में पहुँच गयी ।किसानों , मजदूरों और मिडिल क्लास के हाथों से पर्चेज़िंग पावर छीन लेने के बाद यहाँ या विदेश के उद्योगों में बने माल को खरीदेगा कौन ? कहीं हम अफ़रा तफ़री में चीन और अमेरिका की नकल करके अपने ही पैरों पर  कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हैं  ? कहीं ऐसा न हो पूरी की लालच   में आधी रोटी से भी हाथ धो बैठें ।पतलून की फ़िराक में लँगोटी भी गँवा दें ।

हमें ऐसी सरकार चाहिये जो सरकार की तरह से काम भी करे ।उसमें और छोटे बच्चों के मन गढ़न्त खेलों में अन्तर होना चाहिये ।बच्चे जब डाक्टर-  डाक्टर खेलते हैं तो अपने को  डाक्टर समझते हैं , पर होते नहीं हैं ।वह एक दूसरे के कपड़े पकड़ कर रेल-  रेल खेलते हैं पर वह रेल नहीं होती है।एक लाठी पर बैठ कर टिक- टिक - घोड़ा कह कर दौड़ते हैं पर वहाँ कोई घोड़ा नहीं होता ।उसी तरह से सरकार को  सरकार - सरकार खेलना बन्द करके  सचमुच में सरकार चलानी चाहिये,  सचमुच में विकास करना चाहिये , सचमुच में सबको साथ लेकर चलना चाहिये , सचमुच में कम से कम उतना तो  कर ही देना  चाहिये जो अभी तक की तथा कथित निहायत निकम्मी,   भ्रष्ट और लुटेरी सरकारें करती रही हैं ।

Saturday, April 14, 2018

भीम राव अम्बेडकर

भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रेल 1891 को महाराष्ट्र की महार जाती में हुआ था। इस जाती के लोग मैला उठाने का काम करते थे और इन्हें उच्च जात द्वारा अपवित्र माना जाता था। इन लोग को मंदिरों में प्रवेश की इजाज़त नही थी साथ ही अनेक सामाजिक और धार्मिक निषेध इन्पर लागू थे।
दक्षिण के त्रावंकोर राज्य में तो अछूतों को गले में घंटी पहनाकर कर चलने की प्रथा थी ताकि उच्च जात वालो को इनकी घंटी की आवाज़ से इनके आस पास होने की आहट मिल सके जिससे वह इनकी अपवित्र परछाई के संपर्क में आने से भी बच सकें।
इस हद तक छुआ छूत चरम पर थी उस समय के आंबेडकर साहब जब पढ़ लिख कर बाबू बन कर अपने ऑफिस में आए तो उनका चपरासी तक उनको पानी का ग्लास दूर से देता था ताकि उनका हाथ उसके छु न जाए और उसकी उच्च जात अपवित्र न हो जाए।
आंबेडकर साहब जान गये थे के इस छुआ छूत की बिमारी से निजात कानून बना कर ही ली जा सकती है।
इसलिए उन्होंने दलितों को शिक्षा ग्रहण करने की वकालत की और साथ ही कानूनी स्तर पर दलितों को समाज में बहतर स्थान दिलाने का प्रयत्न किया।
आज आंबेडकर साहब के प्रयासों का ही नतीजा है जो हम अस्प्रश्यता को समाज में कम होता देख पाए हैं।
लेकिन ये कहना कतई ग़लत नही होगा के आज भी उच्च जाती के तमाम लोगो के दिलो से नीची जाती के लिए नफरत और घ्रणा को हम निकाल नही पाए हैं।
मैं अक्सर देखती हूँ दलितों के ऊपर लिखने वाले आंबेडकर पर भाषण देने वाले पढ़े लिखे लोग भी नीची जाती के पढ़े लिखे व्यक्ति को अपने साथ खड़ा पाकर मूह नाक सिकोड़ते हैं। हैरत होती है मुझें के हमारा समाज सभ्य हुआ भी है के बस हम दिखावा कर रहे हैं?


शायद अस्प्रश्यता को जड़ से मिटाने के लिए केवल कानून ही काफी नही
इसके लिए हमे लोगो के दिलो को भी बदलना पड़ेगा तभी सही मायने में छुआ छूत की भावना मिट पाएगी अन्यथा दोगला चरित्र लिए उच्च जात के कुछ ठेकेदार निम्न जात को हीन द्रष्टि से तकते रहेंगे और साथ ही मूह नाक सिकोड़ कर उनके हक के लिए लड़ने का ढोंग भी करते रहेंगे।