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Tuesday, July 17, 2018

अर एस एस

संघ प्रमुख बनाम प्रणब दा

मेरी तरह बहुत लोगों ने बड़ी उत्सुकता से संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत और भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुना ।दोनों ही भाषणों में जिस प्रत्यक्ष या परोक्ष आक्रामकता की अपेक्षा थी वह बहुत बारीकी से तलाशने पर भी नहीं मिली ।टक्कर तो बराबर की थी ।एक तरफ़ आर एस एस के प्रमुख जो इस समय देश की सर्वोच्च सत्ता के प्रतिनिधि हैं और दूसरी तरफ़ विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठतम और सम्मानित नेता  श्री प्रणब मुखर्जी।यह वैचारिक वैषम्य  एक घमासान युद्ध का रूप भी ले  सकता था  । इसी लिये जिज्ञासा का स्तर बहुत ऊँचा था ।

चार साल से हम आर एस एस के लोगों को जिस तरह की असभ्य भाषा और अनर्गल दुष्प्रचार के माध्यम से पहचानते आए हैं उस से  संघ प्रमुख को सर्वथा विपरीत रूप में पाया ।भा ज पा के नेताओं  और  खास तौर पर मोदी जी के एक ही जैसे रटे रटाए भाषण सुनतेसुनते कान पक चुके हैं - सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ,  गाँधी और नेहरू ने देश का बँटवारा करा दिया,  पटेल को प्रधान मंत्री नहीं बनाया , इमर्जेन्सी लगा दी,  वंशवाद चलता है  ,  मुस्लिम तुष्टीकरण होता है वगैरह वगैरह ।पर संघ प्रमुख के उस भाषण में ऐसी कोई बयान बाजी का अनुपस्थित होना  सर्वथा  अप्रत्याशित था ।संघ प्रमुख और प्रधान मंत्री के विचारों और आचरण में इतना भारी अन्तर क्यों है  ? दोनों में से कौन आर एस एस का सही प्रतिनिधि है  ? यह एक अहम सवाल हैजिसका जवाब जनता को मिलना चाहिये ।

आर एस एस के पास  तीन मुद्दे ही प्रमुख हैं - राम मंदिर , धारा  370 और कामन सिविल कोड ।पर  संघ प्रमुख ने इनका ज़िक्र तक नहीं किया ।न उन्होंने देश को मुस्लिम मुक्त करने की घोषणा की और न हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात की जबकि भाषण का विषय राष्ट्रीयता ही था ।।भा ज पा के नेता जिस तरह से मुसलमानों और दलितों की हत्या का अनुमोदन करते हैं वह भी अनुपस्थित था ।न गाय,  गोबर और गोमूत्र का महिमामंडन था और न साम्प्रदायिक नफ़रत का ज़हर कहीं देखने को मिला ।तो फिर एक सवाल मन में उठता है कि क्या आर एस एस की सोच का दायरा हिंसा , असहिष्णुता और असभ्यता के बाहर भी कभी  हो पाना संभव  है  ? क्या संघ प्रमुख ऐसी ही बातें संघ के सदस्यों से नहीं करते हैं  ? फिर वह लोग संघ प्रमुख की अवहेलना क्या जान बूझ कर करते हैं   ?

श्री मोहन भागवत  के भाषण में भले ही प्रणब दा के भाषण जैसी शास्त्रीयता , तथ्यात्मक वैविध्य और व्यापकता नहीं थी किन्तु जो आडम्बरहीन सरलता थी उसने मन पर गहरी छाप छोड़ी ।क्या वजह है कि आर एस एस के लोग संघ प्रमुख जैसी भाषा का प्रयोग नहीं करते  ? उनकी तरह विविधता में अंतर्निहित एकता को नहीं देख पाते  ? दूसरे के दृष्टिकोण  को समझने का प्रयत्न नहीं करते  ? पूरे देश को एक परिवार के रूप में नहीं देख पाते  ?  लोक तंत्र का सम्मान नहीं कर पाते  ? देश को उस राष्ट्र के रूप में नहीं स्वीकार करते जिसमें सब समान रूप से भागीदार हैं ? 

आर एस एस में यह घोर अन्तर्विरोध एक अबूझ पहेली बना हुआ है ।उसे विश्व की सबसे  बड़ी संस्था होने का गौरव कोई  सैद्धान्तिक सोच रखे बिना  हासिल हो गया हो , यह संभव नहीं है ।संघ के कार्यकर्ताओं का अनुशासन और सेवा भाव सदैव प्रशंसित होता है ।संघ के लोग देश के सभी प्रशासनिक और संवैधानिक पदों पर आसीन हैं ।फिर उनके माध्यम से संघ प्रमुख के भाषण वाली सोच का प्रसार आज तक क्यों नहीं हुआ   ? जिस प्रकार की  सत्ता उसके हाथ में है और जिस प्रकार की सोच संघ प्रमुख की दिखाई दी इन दोनों का समन्वय हो जाता तो देश में सर्वत्र शान्ति और सद्भावना का प्रसार नजर आता ।क्या कारण है कि गले में  भगवा अँगौछा डाल कर कैसा भी अपराध करने की छूट हासिल हो जाती है  ?क्या कारण है कि मुसलमान की हत्या करने वाले की शोभा यात्रा निकाली जाती है  ? क्या कारण है कि बलात्कारियों के समर्थन में भा ज पा के नेता सड़क पर आ जाते हैं  ? क्या कारण है कि घोड़े पर बैठने का साहस करने  वाले दलित की हत्या कर दी जाती है  ? ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके विषय में संघ के विचारकों को आत्म मंथन करना चाहिये ।

उधर कांग्रेसियों को श्री प्रणब मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में जाने पर अकारण ही चिन्ता हो रही थी ।उन्होंने अपने भाषण में राष्ट्रीयता के सभी आयामों का बहुत गुरु गंभीर विश्लेषण किया ।लोग चाहते थे कि वह संघ के खेमे
में जाकर उनकी नीतियों की निन्दा करें, उनको अकल सिखाएँ । किन्तु उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं किया ।केवल कांग्रेस के आदर्शों  के आलोक में लोकतंत्र की महत्ता को स्थापित किया ।जिस तरह से संघ प्रमुख ने कोई ओछी बात कहकर कांग्रेस पर कोई प्रहार नहीं किया वैसे ही श्री प्रणब मुखर्जी ने कोई भी निन्दात्मक टिप्पणी  नहीं की ।दोनों ने  उसी गरिमा का निर्वाह किया जैसी उनसे अपेक्षित थी । बहरहाल इस समारोह में टक्कर तो दो दिग्गजों में थी लेकिन मैच फ़्रेन्ड्ली रहा  और अन्त में ड्रा भी हो गया  ।न तो एक दूसरे की प्रशंसा की गयी और न निन्दा ।संघ संघ रहा और प्रणब प्रणब ।

Monday, May 7, 2018

जैसे पेड़ खजूर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ ?

आजकल एक अजीब किस्म की दबंगई देखने में आ रही है ।एक दल विशेष बहुमत के साथ सत्ता में आ गया है ।इससे इस दल के अदना से अदना नेता को भी यह गुमान हो गया है कि वह ज्ञान के मामले में किसी अरस्तू या सुकरात से कम नहीं है।कोई कहता है कि बाल विवाह करने से लव जिहाद नहीं होगा,  कोई कहता है कि मैगी खाने  से बलात्कार हो जाता है,  कोई कहता है कि महाभारत में इंटरनेट मौजूद था,  कोई कहता है कि हर हिन्दू को आठ बच्चे पैदा करने चाहिये ।बात इनकी बौद्धिक विकलांगता  तक सीमित नहीं है ।ये जब चाहें कानून और व्यवस्था को भी  अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते हैं ।ये एयर लाइन्स के उच्च पदाधिकारी की पिटाई लगा सकते हैं ।ट्रेन को अपने आदेश पर चलने के लिये बाध्य कर सकते हैं ।प्रशासनिक  अधिकारी को थप्पड़ मार सकते हैं ।पुलिस कर्मी तो आए दिन इन नेताओं से पिटा ही करते हैं ।कदम - कदम पर इनका दंभ जनता को लाल - लाल आँखें दिखाता हुआ  यह सवाल पूछता है  - जानते नहीं मैं कौन हूँ  ?

हुज़ूर माई बाप,  हम जानते हैं कि आप सरकार हैं ।पर शायद आप खुद नहीं जानते कि आप सरकार हैं ।आप यह तो   जानते हैं कि एक अकेले नेता के धुआँधार भाषण पूरी पार्टी को लोक सभा के अलावा देश के 20 राज्यों पर कब्ज़ा दिला सकते हैं पर आप यह नहीं जानते कि कब्ज़ा पाने के बाद उक्त पार्टी पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी भी आ जाती है ।वह सरकार किस काम की जो केवल अपने और अपने चहेतों के ठाट बाट पर देश की सारी संपत्ति स्वाहा कर दे । जनता की अपेक्षाओं की तरफ़ से अपनी आँखें पूरी तरह से बन्द किये रहे। सुशासन के नाम पर  भाषण ही  भाषण पेलती रहे ।

कबीर दास ने लिखा था -

बड़ा हुआ तो क्या हुआ,  जैसे पेड़ खजूर ।
  पंथी को छाया नहीं ,  फल लागे अति दूर ॥

खजूर का पेड़ होने को तो बहुत बड़ा है पर उसकी उपयोगिता क्या है ? पथिक उसकी छाया में विश्राम नहीं  कर सकता है और उसका फल इतनी दूर होता है कि कोई उसको तोड़ कर अपनी भूख नहीं मिटा सकता ।यानी आपकी सार्थकता सरकार बना लेने में नहीं उसका लाभ जनता तक पहुँचा देने में है ।आपको पता भी है कि जनता क्या चाहती है  ?

धर्म के नाम पर मारकाट , बलात्कार और दंगा फ़साद आपके कुछ उपद्रवी समर्थकों  को हिंसक आनन्द  भले ही प्रदान करता हो पर आम भारतीय हिन्दू या मुसलमान  सौहार्द्र - प्रिय है ।वह सदियों से धार्मिक और सामाजिक विभिन्नताओं  के प्रति सहिष्णु रहा  है ।सरकार से उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा है कि वह ऐसा  शान्ति पूर्ण वातावरण प्रदान करे  जिसमें आम जनता सुरक्षित महसूस करे । उसके जीवन में स्थायित्व हो ।वह अपने वर्तमान और भविष्य की खुशहाली को अंजाम देने के लिये उद्यम कर सके ।

उद्यम प्रदान करना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।मौजूदा सरकार सालाना तीन करोड़ रोज़गारों का सृजन नहीं कर सकी तो कोई बात नहीं ।लेकिन आम नागरिक चिन्तित इस बात से होता है कि बिना किसी पूर्व सूचना या तैयारी के यह सरकार अकस्मात कोई भी नया कानून बनाती  है और धड़ाम से  लाखों लोग सड़क पर आ जाते हैं ।नोट बन्दी और जी एस टी ने  रोजगार के क्षेत्र में जो तबाही मचाई थी वह  किसी सुनामी से कम नहीं थी । और भी ताबड़तोड़ लिये गये  छोटे-  छोटे फ़ैसले इस तबाही के  लिये जिम्मेदार रहे हैं ।गो वध पर प्रतिबन्ध लगा , लाखों लोग बेरोज़गार हो गये ।शराब बन्दी आई , लाखों लोग बेरोज़गार हो गये ।शिक्षा नीति बदली , लाखों शिक्षा मित्र बेरोजगार हो गये , एन सी ई आर टी की पुस्तकें अनिवार्य कर दी गयीं , लाखों निजी प्रकाशनों से जुड़े हुए लोग बेरोज़गार हो गये ।इस आए दिन के बेरोज़गारी  बढ़ाओ अभियान का शिकार हो चुके लोग कैसे यह मान लें वह  खुशहाल हैं  ? या उनके खुशहाल हो जाने  की कहीं कोई संभावना है ।

खुशहाल रहने के लिये धन चाहिये ।आवश्यक सुविधाएँ चाहिये ।देश की 80%  जनता कृषि और छोटे उद्योगों पर निर्भर थी ।उस साधारण जनता की आर्थिक हैसियत पर बढ़ती हुई महँगाई और टैक्सों की लूट ने डाका डाला है ।
सरकार की अनुभव हीनता के परिणाम स्वरूप देश की 73%  पूँजी केवल 1% बड़े उद्योग पतियों की तिजोरी में पहुँच गयी ।किसानों , मजदूरों और मिडिल क्लास के हाथों से पर्चेज़िंग पावर छीन लेने के बाद यहाँ या विदेश के उद्योगों में बने माल को खरीदेगा कौन ? कहीं हम अफ़रा तफ़री में चीन और अमेरिका की नकल करके अपने ही पैरों पर  कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हैं  ? कहीं ऐसा न हो पूरी की लालच   में आधी रोटी से भी हाथ धो बैठें ।पतलून की फ़िराक में लँगोटी भी गँवा दें ।

हमें ऐसी सरकार चाहिये जो सरकार की तरह से काम भी करे ।उसमें और छोटे बच्चों के मन गढ़न्त खेलों में अन्तर होना चाहिये ।बच्चे जब डाक्टर-  डाक्टर खेलते हैं तो अपने को  डाक्टर समझते हैं , पर होते नहीं हैं ।वह एक दूसरे के कपड़े पकड़ कर रेल-  रेल खेलते हैं पर वह रेल नहीं होती है।एक लाठी पर बैठ कर टिक- टिक - घोड़ा कह कर दौड़ते हैं पर वहाँ कोई घोड़ा नहीं होता ।उसी तरह से सरकार को  सरकार - सरकार खेलना बन्द करके  सचमुच में सरकार चलानी चाहिये,  सचमुच में विकास करना चाहिये , सचमुच में सबको साथ लेकर चलना चाहिये , सचमुच में कम से कम उतना तो  कर ही देना  चाहिये जो अभी तक की तथा कथित निहायत निकम्मी,   भ्रष्ट और लुटेरी सरकारें करती रही हैं ।

Saturday, April 14, 2018

भीम राव अम्बेडकर

भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रेल 1891 को महाराष्ट्र की महार जाती में हुआ था। इस जाती के लोग मैला उठाने का काम करते थे और इन्हें उच्च जात द्वारा अपवित्र माना जाता था। इन लोग को मंदिरों में प्रवेश की इजाज़त नही थी साथ ही अनेक सामाजिक और धार्मिक निषेध इन्पर लागू थे।
दक्षिण के त्रावंकोर राज्य में तो अछूतों को गले में घंटी पहनाकर कर चलने की प्रथा थी ताकि उच्च जात वालो को इनकी घंटी की आवाज़ से इनके आस पास होने की आहट मिल सके जिससे वह इनकी अपवित्र परछाई के संपर्क में आने से भी बच सकें।
इस हद तक छुआ छूत चरम पर थी उस समय के आंबेडकर साहब जब पढ़ लिख कर बाबू बन कर अपने ऑफिस में आए तो उनका चपरासी तक उनको पानी का ग्लास दूर से देता था ताकि उनका हाथ उसके छु न जाए और उसकी उच्च जात अपवित्र न हो जाए।
आंबेडकर साहब जान गये थे के इस छुआ छूत की बिमारी से निजात कानून बना कर ही ली जा सकती है।
इसलिए उन्होंने दलितों को शिक्षा ग्रहण करने की वकालत की और साथ ही कानूनी स्तर पर दलितों को समाज में बहतर स्थान दिलाने का प्रयत्न किया।
आज आंबेडकर साहब के प्रयासों का ही नतीजा है जो हम अस्प्रश्यता को समाज में कम होता देख पाए हैं।
लेकिन ये कहना कतई ग़लत नही होगा के आज भी उच्च जाती के तमाम लोगो के दिलो से नीची जाती के लिए नफरत और घ्रणा को हम निकाल नही पाए हैं।
मैं अक्सर देखती हूँ दलितों के ऊपर लिखने वाले आंबेडकर पर भाषण देने वाले पढ़े लिखे लोग भी नीची जाती के पढ़े लिखे व्यक्ति को अपने साथ खड़ा पाकर मूह नाक सिकोड़ते हैं। हैरत होती है मुझें के हमारा समाज सभ्य हुआ भी है के बस हम दिखावा कर रहे हैं?


शायद अस्प्रश्यता को जड़ से मिटाने के लिए केवल कानून ही काफी नही
इसके लिए हमे लोगो के दिलो को भी बदलना पड़ेगा तभी सही मायने में छुआ छूत की भावना मिट पाएगी अन्यथा दोगला चरित्र लिए उच्च जात के कुछ ठेकेदार निम्न जात को हीन द्रष्टि से तकते रहेंगे और साथ ही मूह नाक सिकोड़ कर उनके हक के लिए लड़ने का ढोंग भी करते रहेंगे।


Wednesday, March 14, 2018

कौन है तेरा दीवाना सांग बुढ़ाना में रिलीज़

रचना सोडियान / हुसैन अहमद
मुज़फ्फरनगर /बुुढाना ।हिंदी सोंग कौन है तेरा दीवाना आज बुढाना मे रिलीज कर दिया गया। यह गाना बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता तोसीफ राही द्वारा अपने काजीवाडा स्थित आवास पर लांच किया गया। यहां पर बसपा नेता तोसीफ राही द्वारा हिंदी सांग कौन है तेरा दीवाना का पोस्टर भी लांच किया गया। इस गाने को पहले बसपा नेता तोसीफ राही द्वारा देखा गया जिसकी उन्होने बहुत ही तारीफ की और कहा कि यह गाना ऐसा है कि मार्किट में आते ही लोगों द्वारा गुनगुनाया जायेगा। इसके बाद यह गाना लांच होते ही यहां मौजूद गीत के प्रोड्युसर रऊफ अहमद सिद्दीकी ने इसको यू ट्यूब पर डलवा दिया। यहां पर रऊफ अहमद सिद्दीकी ने बताया कि इस गीत मे फिल्म अभिनेता जुल्फी राजपूत व अभिनेत्री प्रिया सिंधु ने बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है। इस गीत के डायरेक्टर अयाज खान व कैमरामेन ड्रामा फार यू द्वारा अच्छी तरह से फिल्मांकन किया गया। इस गाने के मैनेजिंग डायरेक्टर नसीम कुरैशी हैं। इस सोंग की शूटिंग लगभग दस दिन पहले जनपद शामली के कस्बा कांधला मे कई स्थानों पर हुई थी। इसके अलावा कुछ भाग विगत दिवस नोएडा भी फिल्माया गया था। रऊफ अहमद सिद्दीकी ने बताया कि वे इसी माह बुढाना में टी वी सीरियल मुजरिम कौन के सातवें एपीसोड की शूटिंग करेंगे जिसमें बुढाना व आसपास के नये कलाकारों को मौका दिया जायेगा। इस मौके पर दैनिक बिजनोर टुडे के कार्यकारी संपादक योगेंद्र पंवार, जनपद शामली के पत्रकार अख्तर कुरैशी (कांधला) भी मौजूद रहे। दूसरी और यहां पर नोएडा से प्रकाशित मासिक पत्रिका जनता की खोज का भी बसपा नेता तोसीफ राही द्वारा विमोचन किया गया। जनता की खोज के संपादक रऊफ सिद्दीकी ने जनता की खोज पत्रिका का जनपद मुजफ्फरनगर का ब्यूरो चीफ, रचना सोडियान को बुढाना तहसील प्रभारी व हुसैन अहमद को बुढाना संवाददाता बनाया है। इसके अलावा अख्तर कुरैशी को जनपद शामली का ब्यूरो चीफ नियुक्त किया है।

पांवों को लहू लुहान करके किसानों ने क्या हासिल किया

किसानों का साज़ और उनके  साज़िंदे 

पैंतीस हजार किसानों की एक सौ सत्तर किलोमीटर लंबी यात्रा पाँच दिन में पूरी हुई ! इतनी बड़ी संख्या में किसानों के रात्रि विश्राम , भोजन , शौच आदि की व्यवस्था कितनी कठिन और खर्चीली रही होगी इसकी कल्पना की जा सकती है ।इतने विराट आयोजन को देख कर लगने लगा था कि इस बार कुछ न कुछ हो कर ही रहेगा ।जनता अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने जब सड़क पर उतर आये तो उसे क्रान्ति कहते हैं,  विप्लव कहते हैं,  इंकलाब कहते हैं ।किसानों का यह मोर्चा तब और भी अमोघ लगने लगा था जबकि इसके आयोजक मार्क्सवादी दल को कांग्रेस, शिव सेना और एन सी पी ने भी अपना समर्थन दे दिया था ।टी वी पर बार बार लाल झंडों और लाल टोपियों का सैलाब-
लाली मेरे लाल की,   जित देखूँ तित लाल
की अनुभूति जगाने लगा था ।

इस दांडी मार्च का नतीजा भी  सरकार विरोधी हर आन्दोलन की तरह टाँय टाँय फिस्स हो गया ।इतनी मेहनत करके,  कड़ी धूप में पैदल चलके,  पाँवों को लहूलुहान करके किसान क्या हासिल करने को निकले थे  ? क्या उनके पास कोई सुविचारित योजना थी या मुँह उठाया और  अपना काम काज छोड़ कर बस यूँ ही निकल  पड़े थे ? यदि साज़ तो हो पर साज़िन्दे न हों तो संगीत समारोह का आडंबर मत रचिये ।इससे हासिल कुछ नहीं होगा ऊपर से आपकी किरकिरी होगी सो अलग ।

किसान आज की राजनीति में असीम संभावनाओं से युक्त एक "मसाला" बनता जा रहा है ।राजनैतिक दलों को लगता है कि किसानों का संगठन सत्ता को चुनौती देने का एक कारगर साधन बनाया जा सकता है ।कभी तमिनाडु के , कभी उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के, कभी राजस्थान के किसान सिर उठाते हैं और मुँह की खाकर खामोश हो जाते हैं ।इस बार  भी इस विशाल पद यात्रा के आगे सरकार के छक्के छूट जाने चाहिये थे ।प्रदर्शन सर्वथा गाँधीवादी और शान्तिपूर्ण था ।सरकार न उस पर लाठी  चार्ज कर सकती थी , न गोली चला सकती थी और न जेल भेज सकती थी ।फिर भी उसने जता दिया कि इस शक्ति के संग्राम में विजय किस की  होगी । सरकार ने कुछ भी न देकर ऐसा जता दिया कि उसने सब कुछ दे डाला है और प्रचार तंत्र ने ढोल बजाना शुरू कर दिया कि किसान संतुष्ट हो गये हैं ।उनकी सारी माँगें मान ली गयी हैं ।किसानों को भविष्य में उनकी माँगें पूरी करने के आश्वासन का लौलीपौप थमा दिया गया और आन्दोलन की हवा निकल गयी ।आश्वासनों के सहारे तो यह सरकार चार साल से चैन की बंसी बजा रही है ।

किसान की समस्या क्या है ? इसके बारे में किसान स्वयं भी स्पष्ट नहीं हैं ।न राजनैतिक दल स्पष्ट हैं और न सरकार ।किसी जमाने में कहा जाता था -
उत्तम खेती मध्यम बान , निखत चाकरी भीख निदान ।
वह जमाने अब लद चुके हैं क्योंकि खेती के व्यवसाय में उसे  "उत्तम "बनाने के सारे साधन लुप्त हो चुके हैं ।हरित क्रान्ति के साथ कृषि का तकनीकीकरण स्वाभाविक था ।किन्तु समस्या यह है कि सरकार ने एक ओर तो तकनीकीकरण को बढ़ावा दिया जिसके बिना अन्न उत्पादन में क्रान्ति नहीं आ सकती थी , दूसरी ओर अपनी समाजवादी प्रतिबद्धता के कारण  जब हरित क्रान्ति अपने उत्कर्ष   पर पहुँची तो अधिकतम जोत सीमा का कानून आ गया।यह आया तो 1974. में पर लागू हुआ 1971 की अवधि से ।इसके अनुसार कोई भी खेतिहर अधिक से अधिक 18. एकड़ भूमि पर कृषि कर सकता है ।नतीजा यह हुआ कि कृषि योग्य भूमि बेहद छोटे छोटे खंडों में वितरित होती चली गयी ।पुरानी जीवन शैली इस से अप्रभावित रह सकती थी जब किसान का पूरा परिवार कृषिकार्य करके अपने भर को अनाज उगा लेता था ।किन्तु आज की जीवनशैली केवल अनाज पर आधारित नहीं है ।किसान के बच्चे भी पढ़ते हैं , उनको भी जूते कपड़े , इलाज , मनोरंजन , शादी ब्याह पर खर्च करने के लिये पैसा चाहिये ।वह भी उन्नत बीज,  खाद,  कीटनाशक न खरीदें तो अनाज नहीं पैदा होगा ।वह भी ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के  सहारे खेती करने को बाध्य हैं ।अनाज बेच कर वह इतना पैसा नहीं कमा पाते कि अपनी पारिवारिक और खेती के सारे खरचे निकाल पायें ।उनको बैंकों से कर्ज मिलता है तो भी साहूकारों  की शरण में जाना पड़ता है ।

कर्ज देना और माफ़ करना उनकी समस्या का हल नहीं है ।जिस तरह खाना खा लेने से भूख लगना बन्द नहीं हो जाता वैसे ही कर्ज लेना उनकी जरूरत को पूरा नहीं करता ।स्वामीनाथन की रिपोर्ट के अनुसार एक किसान की आमदनी को एक सरकारी चपरासी के वेतन के बराबर लाना होगा ।इसके लिये दो बातें जरूरी हैं ।एक तो यह कि किसान जो उपभोक्ता सामग्री खरीदे उसके मूल्य के अनुसार उसकी उपज का मूल्य उसे प्राप्त  हो ।यह "पैरिटी औफ़ प्राइस" पूरे संसार में कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित करती है ।दूसरे यह कि सरकार जो   समर्थन मूल्य घोषित करे उस पर हर किसान का अनाज खरीदे भी । होता यह है कि इस खरीद पर इतनी पाबंदियाँ लग जाती हैं कि प्रायः किसान अपना अनाज औने पौने दामों पर बिचौलियों को  बेचने के लिये बाध्य हो जाते हैं ।मार्केटिंग की यही समस्या फल और सब्जी बेचने पर भी आती है ।अतः सरकार से कर्ज़ माफ़ी के  अलावा उचित मूल्य , उचित मार्केटिंग और जोत की सीमा बढ़ाने की माँग होनी चाहिये ।यदि व्यापार और उद्योग पर कोई अधिकतम सीमा नहीं है तो खेती पर यह प्रतिबंध क्यों  ? आधुनिकतम कृषि तकनीक का पूरा लाभ उठाने से कृषि क्षेत्र को क्यों वंचित रखा गया है   ? क्यों ऐसा भ्रम फैला हुआ है कि किसान को गरीब ही रहना  चाहिये ।क्यों नहीं उसको भी उद्योगों की तरह विकसित करने की  योजनाएँ बनतीं  ? क्यों किसान को केवल आश्वासन का तोहफ़ा मिलता है ? क्यों नहीं कोई राजनैतिक दल किसानों की कर्ज़ माफ़ी के दायरे से बाहर निकल कर कुछ ठोस उपायों पर भी  विचार करता  ? देश की  73% पूँजी यदि 1% लोगों  के पास सिमट गयी है तो यह असंतुलन कृषि क्षेत्र को विकसित करने से ही दूर होगा आश्वासनों से नहीं।

Thursday, March 8, 2018

हरियाणा में महिलाओं के हालात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा है कि जिस हरियाणा में कल तक बेटियों को हीन दृष्टी से देखा जाता था, आज उसी हरियाणा की बेटियां हर क्षेत्र में कमाल कर रही हैं। आज हरियाणा के लिंगानुपात में खासा सुधार हुआ है और अब हरियाणा में बेटियां बोझ नहीं, बल्कि अपने परिवार की आन-बान शान हैं।
लगता है कि हाल में आई रिपोर्ट को प्रधानमंत्री ने नहीं पढ़ा है। आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में हरियाणा में हर दिन कम से कम चार महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ। सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में हरियाणा अव्वल रहा। सीएडब्ल्यू सेल द्वारा 2017 के अंत में जारी किए गए आंकड़ों ने महिलाओं की स्थिति की जमीनी हकीकत खोल कर रख दी है। सेल द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 के एक जनवरी से 30 नवंबर के बीच राज्य में 1,238 महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। यानी राज्य में प्रत्येक दिन कम से कम चार महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुए। इसके अलावा समान समयावधि में महिला उत्पीड़न के 2,089 मामले दर्ज हुए। हरियाणा पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समयावधि में महिलाओं के साथ अपराधों के कुल 9,523 मामले दर्ज हुए। इससे दुष्कर्म और उत्पीड़न को हटा दिया जाए तो 2,432 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के दर्ज किए गए और 3,010 महिलाएं दहेज उत्पीड़न का शिकार हुर्इं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 के दौरान हरियाणा में सामूहिक दुष्कर्म के 191 मामले दर्ज किए गए, जो देश के सबसे बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश से कहीं ज्यादा हैं।
मोदी जी यह है हरियाणा में महिलाओं की स्थिति।