रऊफ अहमद सिददीकी की दुनिया में आपका स्वागत है

Friday, June 9, 2017

रक्त्तदान महा दान

रक्तदान के कई फायदे होते हैं। जब आप रक्तदान करते हैं तो आप कैंसर (cancer) के खतरे को दरकिनार कर देते हैं। ऐसा करने से आपको हेमोक्रोमाटोसिस (hemochromatosis) की समस्या का भी सामना करना नहीं पड़ता। इस प्रक्रिया में लिवर और पाचन ग्रंथि (liver and the pancreas) को भी काफी कम नुकसान पहुंचता है।
आपके रक्तदान करने से दिल का स्वास्थ्य काफी अच्छा रहता है और आपके मोटे होने की संभावना काफी कम हो जाती है। रोज़ाना रक्त का संचार होने से लाखों जानें बच जाती हैं। रक्तदान करना स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होता है। यह रक्तदान करने वाले के लिए और मरीज़ के लिए भी काफी अच्छी होती है।

रक्त के संचार की गम्भीरता (The seriousness of blood transfusion)

रक्तदान के मामले को हलके में लेना बिलकुल सही नहीं है। ऐसा किसी डॉक्टरी विशेषज्ञ की देखरेख में ही होना चाहिए। रक्तदान की प्रक्रिया अस्पतालों, क्लिनिक्स (clinics) और ब्लड बैंक्स (blood banks) में ही होनी चाहिए। अगर आपका स्वास्थ्य सही है, तभी आपको रक्तदान करना चाहिए। आगा आपको कोई रक्त आधारित बीमारी है, तो कृपया रक्तदान ना करें। आपको अपनी बीमारी फैलाने का कोई हक़ नहीं है। रक्त के संचार के पहले आपके लिए एक मेडिकल टेस्ट (medical test) में बैठना अनिवार्य है। इससे यह साबित होगा कि आप रक्तदान करने योग्य हैं भी या नहीं।

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रक्तदान आपकी जान कैसे बचाता है ? (How can blood donation save you)

रक्तदान करने से आप मरीजों को कैंसर की भयंकर बीमारी से बचा सकते हैं। रक्तदान उनके लिए भी काफी फायदेमंद हैं जो गंभीर एनीमिया (anemia), रक्त निकलने की समस्या, सिकल सेल एनीमिया (sickle cell amemia) और रक्त की अन्य समस्याओं के शिकार होते हैं। आपके लिए यह जानना काफी ज़रूरी है कि मानव रक्त का निर्माण नहीं किया जा सकता। ये रक्त सिर्फ एक मनुष्य ही आपको प्रदान कर सकता है। यही कारण है कि लाखों की जान बचाने का रक्तदान सबसे प्रभावी विकल्प है। हालांकि इसे दोहराने के लिए आपको रक्तदान करने की अपनी योग्यता को प्रमाणित करना पड़ता है।

रक्त जमा करना और स्वास्थ्य की जांच (Blood storage and health check)

आप अपने खून को जमा कर सकते हैं, जिससे कि भविष्य में इसका प्रयोग किया जा सके। अपने खून को एक नामी ब्लड बैंक में जमा करवाएं, जहां वे रक्त को सहेजने की नवीनतम तकनीकों का प्रयोग कर सकें। आपके रक्तदान करने से पहले एक छोटा सा स्वास्थ्य परीक्षण होता है। इस जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं आपको कोई संक्रमण या रक्त से जुड़ी बीमारी तो नहीं है। अगर आप हेपेटाइटिस या एड्स (hepatitis or AIDS) से ग्रसित हैं, तो आपको अपना रक्तदान करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। अगर आपको हाल में ही सर्दी खांसी हुई है जिसके लिए आपने कोई टीका लिया हो, तो रक्तदान करने से पहले अपने डॉक्टर से इस बारे में पूछताछ कर लें। अगर आपको मधुमेह की समस्या है तो आपका रक्तदान करना सही नहीं होगा।

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रक्तदान नहीं करने के अन्य कारक (More don’ts of blood donation or khoon daan)

अगर आप गर्भवती हैं तो आपके लिए रक्तदान करना उचित नहीं होगा। अगर आप रक्तदान करना चाहती हैं तो अपने डॉक्टर से बात करें और उनसे सलाह करके सही निर्णय लें। अगर आप कैंसर के मरीज़ हैं, तब तो निश्चित तौर पर आपको रक्तदान के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। ऐसा होने से आपके शरीर से रक्त में मौजूद दूषित तत्व भी अन्य व्यक्ति के शरीर में जाएंगे।

आपको हेमोक्रोमाटोसिस से बचाए (Saving you from hemochromatosis)

अगर आप हेमोक्रोमाटोसिस की समस्या से ग्रस्त हैं तो आपको रक्तदान अवश्य करना चाहिए। यह एक स्वास्थ्य समस्या है, जिसके अंतर्गत आपका शरीर अतिरिक्त आयरन (iron) सोख लेता है। यह एक आनुवांशिक बीमारी हो सकती है और आपके ज़रुरत से ज़्यादा शराब पीने की वजह से भी हो सकती है। हेमोक्रोमाटोसिस एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होने की स्थिति में भी हो सकती हैं। एक बार जब आप रक्तदान करना शुरू करते हैं तो आपको आयरन के शरीर में ज़्यादा जमने की समस्या से छुटकारा मिल जाता है। इसके लिए रक्तदान करने वाले व्यक्ति का स्वस्थ रहना काफी आवश्यक है।

स्वस्थ दिल और लिवर के लिए (Having the healthiest heart and liver)

रक्तदान करने से आपका दिल और लिवर दोनों काफी स्वस्थ रहते हैं। शरीर में आयरन की अतिरिक्त मात्रा हो जाने की वजह से आपका दिल और लिवर अस्वस्थ हो सकते हैं। यही कारण है कि आपको सही समय पर रक्तदान करना चाहिए जिससे कि आपको स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या ना हो। अगर आपके शरीर में आयरन की अतिरिक्त मात्रा है तो यह लिवर और किडनी (kidney) में जमा होता रहता है। यह दिल और पाचन ग्रंथियों में भी जाकर जमा हो जाता है। इसके फलस्वरूप आगे जाकर आपको लिवर खराब होने की समस्या से गुज़रना पड़ता है, जिसे सिरोसिस (cirrhosis) कहा जाता है। एक बार आपके रक्तदान करना शुरू करने पर आपके शरीर में आयरन का स्तर नियंत्रित हो जाता है और विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त होने की आपकी सम्भावनाएं काफी कम हो जाती हैं।

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रक्त दान के लाभ हैं रक्तदान से जुड़े तथ्य (Facts related to blood donation se rakt daan ke labh)

एक वयस्क पुरुष / स्त्री में 5-6 लीटर तक रक्त होता है।
कोई भी व्यक्ति हर तीन माह में रक्त दान कर सकता है।
रक्त में प्लाज्मा नामक प्रवाही होता है।
450 मि.ली. रक्त से 3 लोगों का जीवन बचाया जा सकता है।
रक्त दान के लाभ, हर 2 सेकंड में भारत में किसी न किसी व्यक्ति को रक्त की आवश्यकता होती है।
भारत में रक्त दान योग्य व्यक्तियों में सिर्फ 4% ही रक्त दान करते हैं।
75% व्यक्ति वर्ष में एक या दो बार रक्त दान करते हैं।
3 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी रक्त की आवश्यकता पड़ती है।
रक्त कोशिकाओं के प्रकार:
श्वेत रक्त कोशिकाएं जो रोगों से रक्षा करती हैं।
प्लेटलेट्स जो रक्त के बहने पर रक्त का थक्का जमा देते हैं।
रक्त दान के लाभ, लाल रक्त कोशिकाएं जो फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर प्रत्येक कोशिका में पहुंचाती हैं और कार्बनडाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाती हैं।
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रक्त दान के फायदे हैं शरीर का तेज़ी से दोबारा रक्त बनाना (Blood recovery process or khoon dene ke fayde)

24-48 घंटे में पूर्ण मात्रा में प्लाज्मा।
लाल रक्त कोशिकाएं – 3 सप्ताह के अन्दर।
प्लेटलेट्स एवंहल्की रक्त कणिकाएं –मिनटों में।
रक्त दान के फायदे, रक्तदान पूर्णतः सुरक्षित होता है।
रक्त दान के गुण, रक्त दान एक बहुत ही सरल और पुण्य का काम है।
रक्त दान के गुण, रक्त दान में सिर्फ 15-20 मिनट लगते हैं।
रक्त दान के फायदे, आप किसी का जीवन बचा सकते हैं रक्त दान करके।
रक्त दान करने के लाभ (Benefits of blood donation)

रक्तदान से किसी का जीवन बचाया जा सकता है।
नियमित रक्तदान से कुछ बड़ी शारीरिक समस्याओं को कम किया जा सकता है जैसे कोरोनरी ह्रदय रोग,स्ट्रोक, कोलेस्ट्रोल इत्यादि।
रक्त दान करने के लाभ, नयी रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में वृद्धि।
हीमोक्रोमिटोसिस के साथ संपर्क सहज होता है, कैलोरी जलती हैं।
नियमित रक्त दान करने वाला व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर सहजता से रक्त पा सकता है।
रक्त की जांच की नियमित होते रहती है।
समाज के प्रति कर्त्तव्य का निर्वाह होता है।
रक्त दान करने के लाभ, किसी का जीवन बचने की आत्म संतोष की भावना उत्पन्न होती है।
रक्त दान करने के पश्चात अपने नित्य कर्म किये जा सकते हैं।

Thursday, June 8, 2017

मुसलमानों के सब्र का इम्तिहान न ले

मुसलमानों के सब्र का इम्तिहान ना ले।

दिल्ली का बॉर्डर सोनिया विहार अम्बे एन्क्लेव के 25 मुस्लिम परिवारों को रमज़ान में नमाज़ की दिक्कत हुई तो किसी अललाह के नेक बंदे ने 100 ग़ज़ का प्लाट मस्जिद को वक़्फ़ कर दिया,मस्जिद के ज़िम्मेदार लोगों ने सोनिया विहार थाने से मस्जिद में नमाज़ की परमिशन ली जो कि पुलिस द्वारा दे दी गई.अभी 8 दिन ही नई मस्जिद में नमाज़ अदा होते हुए थे कि कुछ अमन के दुश्मनों को यह मस्जिद चुभ गई.बिना किसी वजह बिना किसी तज़दीक के करीबन एक हज़ार आदमियों का झुंड आज दोपहर आता है और बरछा कुदाल,घन, सब्बल लेकर मस्जिद की छत से जय श्री राम के नारे लगाते हुए मस्जिद को तोड़ना शुरू करदेते हैं और देखते ही देखते मस्जिद ज़मीन दोज़ हो जाती है.सवाल यह उठता है कि यह भीड़ तंत्र कभी तो किसी अख़लाक़ को पीट पीटकर उसकी जान ले लेता है तो यही भीड़ तंत्र किसी को ज़िंदा आग के हवाले करदेता है,यह वही भीड़ तंत्र है जिसने 1992 में बाबरी शहीद की तो इस ही भीड़ तंत्र ने गुजरात,मुज़फ्फरनगर को अंजाम दिया.एक तरफ़ अमन शांति का परचम लहराने की बात करने वाले सेक्युलर लोग तो कभी दलाल और भांड मीडिया की आज आंखों पर पट्टी बंधी लगती है.? एक समुदाय की प्राथना स्थल ज़मीन दोज़ कर देने की ख़बर दिखाना तो दूर किसी काने सेक्युलर का मुंह तक नही खुल रहा ?
भीड़ ही अगर सब फैसले करने लगीं तो यक़ीन जानिए यह संविधान खतरे में है.ये पुलिस प्रशासन यह न्यायपालिकाएँ सब पर ताले मार देने होंगे. एक पल को मान भी लिया जाए कि मस्जिद अवेध थी(जब कि पुलिस परमिशन का लेटर अभी भी मौजूद है) चलिये मान भी लिया मस्जिद के पास नमाज़ पढ़ाने की परमिशन भी नही थी ? फ़िर एक भीड़ जो "जय श्री राम"के नारे लगाते हुए कैसे फैसला सुना सकती है ? और अगर मस्जिद अवेध रूप से बनाई भी गई थी तो क्यों उस भीड़ ने क़ानून का सहारा नहीं लिया ? आखिर उस भीड़ को मस्जिद शहीद करने की इजाज़त किसने दी ? पुलिस भी सवालों के घेरे में है कि एक इमारत तोड़ने में करीबन  2/3 घन्टे तो लगे ही होंगे तो क्यों पुलिस वहां नहीं पोहची.
स्थानीय लोग बता रहें हैं कि मस्जिद तोड़ने वालों में से 60% बहारी लोग थे यानी के वही गुजरात,मुज़फ्फरनगर, और सहारनपुर वाला फॉर्मूला की भीड़ बाहर से बुलाओ मारों काटो लूटो और ग़ायब हो जाओ.
अगर ऐसे ही एक समुदाय विशेष एक धर्म विशेष को निशाने पर रखकर जगह जगह इस तरह की बड़ी वारदातें अंजाम दी गईं तो फ़िर इस देश में गृह युद्ध कभी भी छिड़ सकता है.अभी भी मुसलमानों को यहां की क़ानून व्यवस्था और न्यायपालिकाओ पर यक़ीन है लेकिन ऐसी घटनाओं से यह यक़ीन दिन बा दिन कमज़ोर होता जा रहा है.सवाल एक और भी की अगर ये प्राथना स्थल अल्पसंख्यकों का ना होकर बहुसंख्यकों का होता तो क्या होता तब भी यह प्रशासन यह मीडिया ऐसे ही अपनी बगलों में मूंह डालकर बैठे रहते ?

Tuesday, June 6, 2017

N d t v. पर कसता शिकंजा।


5 जून को सीबीआई ने एनडीटीवी न्यूज चैनलों के संस्थापक प्रणय रॉय के दिल्ली स्थित आवास और तीन अन्य स्थानों पर छापामार कार्यवाही की। एनडीटीवी से जुड़ी आर.आर.पी.आर. हार्डिंग्स के दिल्ली और देहरादून के ठिकानों पर भी तलाशी ली गई। एनडीटीवी ने सीबीआई की इस कार्यवाही को परेशान करने वाला बताया है। चैनल का कहना है कि हम भारत में लोकतंत्र और बोलने की स्वतन्त्रता को पूरी तरह से कमजोर कर देने के इन प्रयासों के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। आरोप है कि एनडीटीवी के प्रमोटरों ने आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया है। सीबीआई की जांच में क्या निकलता है? यह आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन इतना जरूर है कि अब मीडिया घरानों को भी साफ-सुथरा रहना पड़ेगा। यूपीए के शासन में एनडीटीवी के प्रमोटरों, पत्रकारों और चैनल से जुड़े अन्य लोगों के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, अफसरों आदि से कैसे सम्बन्ध थे, यह किसी से भी छिपा नहीं है। यह माना कि सत्ता में मीडिया घरानों की दखल होती ही है, लेकिन पांच जून को एनडीटीवी के साथ जो कुछ भी हुआ है, उससे दूसरे मीडिया घरानों को सबक लेना चाहिए। यह किसी से भी छिपा नहीं है कि जब सत्ता के साथ हाथ मिले होते हैं तब मीडिया घरानों को रियायती दरों पर बेशकीमती जमीनें आसानी के साथ मिल जाती हैं। बाद में इन जमीनों को बड़ी कंपनियों को किराए पर दे दिया जाता है। सवाल उठता है कि जो जमीन देश सेवा के लिए पत्रकारिता के नाम पर ली गई है, उसे लाखों रुपए प्रतिमाह किराए पर क्यों दे दिया जाता है? इतना ही नहीं, जब कोई मीडिया सत्ता की गोदी में बैठा होता है तो उसे विज्ञापन भी दिल खोलकर मिलते हैं, लेकिन अब समय आ गया है जब मीडिया को साफ-सुथरा रहना पड़ेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि मौका मिलने पर मीडिया घराना सत्ता की मलाई खाए और जब कोई सत्ता जांच पड़ताल कराए तो लोकतंत्र और पत्रकारिता की दुहाई दी जाए। आज शायद ही कोई मीडिया घराना होगा, जो देश सेवा के लिए पत्राकारिता को एक मिशन के तौर पर कर रहा है। सभी घरानों का व्यवसायिक दृष्टिकोण रहता है। जब व्यवसायिक दृष्टिकोण है तो फिर मीडिया को समाज में अलग क्यों माना जाए। जिस प्रकार साबुन अथवा तेल बनाने वाली कोई कम्पनी काम करती है, उसी प्रकार मीडिया भी अब कमाई का उद्देश्य लेकर चलता है। मीडिया घरानों को अब यह भी समझना चाहिए कि आने वाला समय सोशल मीडिया का है और जिस व्यक्ति के पास मोबाइल फोन है, वह स्वयं पत्रकार है। व्हाट्सएप और फेसबुक के माध्यम से तो खबरों का आदान-प्रदान बहुत तेजी से और अधिक संख्या में हो रहा है।

Saturday, June 3, 2017

क्या हम इस लिए मुसलमान बने थे

मुसलमान के नाम से जो कौम इस वक्त मौजूद है वह खुद भी इस हकीकत को भूल गई है और इसके आचार-व्यवहार ने दुनिया को भी यह बात भुला दी है कि इस्लाम एक आंदोलन का नाम है जो दुनिया में एक उद्देश्य और कुछ सिद्धांत लेकर उठा था और मुसलमान उस जमाअत का नाम रखा गया था जो इस आंदोलन को चलाने के लिए बनाई गई थी। आंदोलन गुम हो गया है, उसका उद्देश्य भुला दिया गया है, उसके सिद्धांतो को एक-एक कर के तोड़ा गया है और उसका नाम अपना मतलब खो देने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम कौमियत के नाम से इस्तेमाल किया जा रहा है। हद यह है कि उन जगहों पर भी इस्तेमाल किया जाता है जहां इस्लाम की बजाए गैर-इस्लाम होता है।
        समाज में जाइए, आपकी मुलाकात मुसलमान शराबियों से होगी, दफ्तर में जाइए, मुसलमान-रिश्वतखोर, अदालत में जाइए, झूठ की गवाही, जालसाजी, फरेब, जुल्म और हर किस्म के नैतिक अपराधों के साथ-साथ मुसलमान शब्द का जोड़ लगा हुआ पाएंगे। जरा गौर तो कीजिए, यह मुसलमान शब्द कितना ज़लील कर दिया गया है! मुसलमान और शराबी! मुसलमान और रिश्वतखोरी! अगर यह सब कुछ एक मुसलमान भी करने लगे तो मुसलमान के अस्तित्व की इस दुनिया में जरुरत ही क्या है?
        इस्लाम तो नाम ही उस आंदोलन का था, जो इन बुराइयों को मिटाने के लिए उठा था। उसने तो मुसलमानों के नाम से चुने हुए लोगों की एक जमाअत बनाई थी, जो खुद उच्च स्तर के लोग थे और समाज सुधार के अलंबरदार थे। उसने अपनी जमाअत में हाथ काटने की, पत्थर मारने की, कोड़े बरसाने की सजाएं इसीलिए तो तय की थीं कि जो जमाअत दुनिया से चोरी, व्यभिचार, बलात्कार आदि को मिटाने के लिए उठी है, खुद उसमें कोई सदस्य ऐसा ना पाया जाए। जिसका काम शराब और चोरी को ख़त्म करना हो उसमें कोई शराबी और चोर ना हो। उसका तो मकसद ही यह था कि जिन लोगों को दुनिया का सुधार करना है वह दुनिया भर से ज्यादा सूचरित्र, उच्च स्तरीय और स्वाभिमानी लोग हों।
        जिस इस्लाम ने ऐसे कड़े अनुशासन के साथ अपना आंदोलन उठाया था और जिसने अपनी जमाअत में छांट-छांट कर सिर्फ उच्च नैतिक स्तर के लोगों को भर्ती किया था, उसकी रुसवाई इससे बढ़कर और क्या हो सकती है कि चोर और शराबी के साथ मुसलमान नाम का जोड़ लग जाए। क्या इस तरह से बेइज्जत होने के बाद भी इस्लाम और मुसलमान की यह अहमियत बाकी रह सकती है कि सर इसके आगे श्रद्धा से झुक जाएं?
        हमारे पढ़े-लिखे तबके की हालत भी कुछ अच्छी नहीं है। सूद का पैसा खाना, जकात न देना, नमाज-रोज से लापरवाही बरतना वगैहरा, इनके लिए जाएज़ हो चुकी है। अपनी जिंदगी के किसी मामले में भी इनको यह मालूम करने की परवाह नहीं होती कि खुदा का कानून इसके बारे में क्या कहता है। यानी कि निचले स्तर से लेकर ऊपर के स्तर तक, आप इस नाम के मुस्लिम समाज का जायज़ा लें तो इसमें आपको भांति-भांति के मुसलमान नजर आएंगे। यह एक चिड़ियाघर है जिसमें हर किस्म के जानवर इकट्ठा कर लिए गए हैं।
        मुसलमानों की जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं से यह कुछ मिसालें जो मैंने पेश की हैं, यह सब एक ही नतीजे की तरफ इशारा कर रही हैं कि इस्लामी आंदोलन इस वक्त अपने पतन के आखिरी दौर में पहुंच चुका है। जहां एक आंदोलन की आत्मा मर जाती है, सिर्फ उसका नाम बाकी रह जाता है।
        मेरे दिल ने बार-बार यह सवाल किया कि इस्लाम, जो कभी आंधी और तूफान की तरह उठा था, जिसके सामने दुनिया की कोई ताकत न ठहर सकी, आज इसकी ताकत किस चीज ने छीन ली? इसका जवाब हर बार मुझे यही मिला कि इस्लामी आंदोलन पर पतन का वही कानून लागू हुआ जिसका मैं ऊपर जिक्र कर चुका हूं। अब सुधार की कोशिश इसके सिवा कुछ नहीं कि इस्लाम को फिर से एक आंदोलन की हैसियत से उठाया जाए और मुसलमान के मायने को फिर से ताज़ा किया जाए। मुर्दों की इस बस्ती में जो थोड़े बहुत मुस्लिम दिल अभी धड़क रहे हैं, उनको जान लेना चाहिए कि अब करने का काम यही है।

Tuesday, May 30, 2017

रोज़े में खजूर की अहमियत

माह ए रमजान का पाक महीना शुरू हो चुका है और आज चौथा रोजा है। यह माह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए खास अहमियत रखता है। रमजान का महीना इस्लामिक कलैण्डर का नौवां महीना होता है। रमज़ान के पाक महीने को कुरान के महीने के नाम से भी जाना जाता है। रमजान का पाक महीना आ गया है। यह माह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए खास अहमियत रखता है। रमजान का महीना इस्लामिक कलैण्डर का नौवां महीना होता है। माना जाता है कि इस महीने में की गई दुआ सचमुच अल्लाह के आशीर्वाद से बक्शी जाती है और सीधे जन्नत तक पहुंचाती है। मान्यता तो यह भी है कि इस समय नरक के द्वार बंद रहते हैं, जिसके पीछे शैतान बंधे होते हैं। रमजान के पाक महीने को कुरान के महीने के नाम से भी जाना जाता है। इस महीने के दौरान हर मुसलमान को ज्यादा से ज्यादा कुरान पढ़ने को कहा जाता है। कहते हैं इस महीने में की गई दुआ अल्लाह कबूल करता है। रमजान के दौरान हर मुसलमान रोज़े का पालन करता है और सूर्यास्त होने पर इफ्तार के साथ इसे तोड़ता है। रमजान का महीना वास्तव में हर मुसलमान के लिए अनुशासन आत्म-नियंत्रण बलिदान और सहानुभूति जगाने का महीना है। और रोजा इन्हीं पवित्र भावनाओं का प्रतीक है। रमजान के दौरान मुसलमान शराब और स्त्री के बारे में गलत विचार से दूर रहते हैं। रमजान के महीने में हर दिन रोजा रखने वाले मुस्लिम परिवार सुबह जल्दी उठ कर भोजन लेने हैं। जिसे सहरी कहा जाता है। सहरी सूरज उगने से पहले ली जाती है। इसे बाद पूरे दिन भूखे प्यासे और दुआओं में बने रहने के बाद सूर्यास्त पर पूरा परिवार इफ्तार करता है। मान्यता के अनुसार इफ्तार से पहले खजूर से अपना रोज़ा खोलना होता है। 

कहाँ जा रही है पत्रकारिता

नारद को पत्रकार के साथ-साथ मीडिया टीचर बताने वाले इस लेख के बीच में एक बॉक्स के अंदर एक नोट नुमा लेख और है. इस नोट को कुसुमलता केडिया ने लिखा है. कुसुमलता के ‘लेक्चर्स’ के कई वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध हैं, जिनमें वो बताती हैं कि भारत में कभी सती प्रथा नहीं थीं क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई और इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी जैसी महिलाएं सती नहीं हुई. इसके साथ ही उनके दुनिया के इतिहास के बारे अपने ही मत हैं जिनको आप खुद सुनें तो बेहतर है.

इस लेख का जिक्र यहां इसलिये जरूरी है कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के पित्तृ संगठन की मुख्य पत्रिका में देश की सबसे बड़ी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी के कुलपति का लेख छपता है. इस लेख में वो तर्क से मीलों दूर जाकर एक खास तरह का एजेंडा पेश करते हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिव और पत्रकारिता की गरिमा को बचाने के लिए स्टेटस पोस्ट करने वाले तमाम युवा, वरिष्ठ और अति वरिष्ठ पत्रकार इससे अनजान रहते हैं. क्या कहेंगे इस पर कि अगर कोई चीज दिल्ली की हद में नहीं घटती तो देश से उसका कोई सरोकार नहीं रहता.

किस तरफ जा रही है हिंदी पत्रकारिता

इस लेख के जिक्र की अगली वजह पर बात करने से पहले चलिए हिंदी पत्रकारिता और खास तौर पर हिंदी वेब पत्रकारिता पर सरसरी निगाह डाल लेते हैं.

हिंदी जर्नलिज़म की वेबसाइट्स को हम तीन हिस्सों में बांट सकते हैं. (इसमें प्रोपेगैंडा वाले पोर्टल शामिल नहीं हैं). एक तरफ वो वेबसाइट्स हैं जो किसी प्रसिद्ध अखबार या टीवी चैनल का डिजिटल वर्ज़न है. इस खांचे में आने वाली हिंदी के तकरीबन सारे नाम कूड़ा परोस रहे हैं.

हिंदी अखबारों के डिजिटल वर्ज़न का कूड़ा तो सबको पता ही है. हिंदी के चैनलों के एक्सटेंशन का कचरा भी इससे अलग नहीं है. हिंदी के सबसे गंभीर चैनल की वेबसाइट को देखें. टैबलॉइड और शोर मचाने वाली पत्रकारिता, किसी भी तरह की ट्रोलिंग से दूरी बनाने वाले चैनल की वेबसाइट पर तकरीबन रोज ही अंतः वस्त्रों में छुट्टियां मनाती हिरोइनों की तस्वीरें देखने की गुजारिश दिख जाएगी.

इसके साथ-साथ मोबाइल पर खींची गई चुड़ैल की फोटो भी दिख जाएगी. पूछा जाना चाहिए कि क्या जर्नलिस्टिक एथिक्स का दायरा डिजिटल पर लागू नहीं होता.

वेबसाइट्स की दूसरी कैटेगरी में उन ई मैग्जीन को शामिल करना चाहिए जिनके पीछे कोई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस नहीं है और जो निष्पक्ष पत्रकारिता की बात करती हैं. इस कैटेगरी में आने वाले ज्यादातर नाम पहले अंग्रेजी में शुरू हुए और बाद में हिंदी में आए. अपवादों को छोड़कर इन वेबसाइट्स की हिंदी और अंग्रेजी कॉन्टेंट की स्थिति में वही फर्क है, जो भारतीय क्रिकेट टीम और भारतीय महिला क्रिकेट टीम की लोकप्रियता में है.

तीसरी श्रेणी की वेबसाइट्स इंटरनेट पर ही शुरू हुईं और उनके पीछे किसी न किसी मीडिया संस्थान का हाथ है. इस कैटेगरी के पास सबसे बेहतर संसाधन होते हैं. एक एलीटनेस होती है कि हम टीवी जैसा कोई क्लीशे नहीं करेंगे. उससे अलग करेंगे. क्योंकि एक मोबाइल फोन और सेल्फी स्टिक के साथ बिना बड़े खर्चे के कहीं से भी रिपोर्टिंग और लाइव किया जा सकता है.

‘इतनी उथल-पुथल के बीच कश्मीर से कितने लाइव हुए?’ जिस सहारनपुर में 3 महीने पहले तमाम लोग चुनावी कवरेज के लिए पहुंचे थे, वहां अब कितने वैकल्पिक पत्रकारों को भेजा गया?

सवाल और भी हैं पर फिलहाल इतने ही काफी रहेंगे. वापस उसी नारदीय लेख पर आते हैं. हिंदी वेब में कितने ऐसे नए और कथित वरिष्ठ पत्रकार हैं जो क्राइम और कोर्ट की प्रोसिडिंग पर लेख लिख सकते हैं. कितने ऐसे लोग हैं जो ऑटोमोबाइल पर अच्छा काम कर रहे हैं. पॉपुलर साइंस और इंटरनेश्नल पॉलिटिक्स की तो बात ही छोड़ दीजिए, अति चर्चित विषय फेमिनिज्म के 3 काल खंडों पर आपने कैसा भी हिंदी आर्टिकल कब पढ़ा था. सायबर लॉ एक्सपर्ट की बात हटाइए, सिनेमा और संगीत पर लिखने का मन रखने वालों में कितने लोग हैं, जो रोचक किस्सों और चर्चित डायलॉग को छोड़कर ओमपुरी, किशोरी अमोनकर या महाश्वेता देवी के रचनात्मक काम की समीक्षा करते हुए ढंग की ऑर्बिच्युरी लिख पाए. एक आध अपवादों के नाम अगर आपके दिमाग में आ रहे हैं तो उनमें से ज्यादातर या तो कथित बेस्ट मीडिया स्कूल के सिस्टम से नहीं आए हैं. या करियर के ज्यादातर समय न्यूज रूम के बाहर रहें हैं.

हिंदी वेब पत्रकारिता का एक पहलू और भी है जिसकी बात किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. न्यूज रूम की भाषा में कहें तो, खबर अच्छी चलाने के लिए सेक्स करना (उस पर खबर करना) जरूरी है. खबरों में सेक्स दो तरह से होता है. एक फूहड़ तरीका है जिसमें उत्तेजक हेडिंग के साथ कुछ तस्वीरें और बातें लिख दी जाती हैं.

दूसरे तरीके में एंटी-पॉर्न बेचा जाता है. इसमें हिदी की सबसे गंभीर वेबसाइट्स पर भी आपको अच्छा खासा मैटर दिख जाएगा. बस उसमें कोई ज्यादा बदनाम हैं तो कोई कम. ऐंटी-पॉर्न के साथ समस्या ये भी है कि उसके कई प्रतिबंधित विषय ऐसे हैं जिन पर बात होनी ही चाहिए. मगर अक्सर इन विषयों के नाम पर कुछ और ही बेचा जाने लगता है.

यकीन मानिये किसी भी विषय पर लिखे गए लेख में स्तन, योनि और लिंग जैसे शब्द आम बोलचाल इस्तेमाल से ज्यादा आ रहे हैं तो इसका मतलब है कि वहां पढ़ने वाले को ‘कुछ और’ ही बेचा जा रहा है.