Monday, December 22, 2014
मुसलमानों के अच्छे दिन
Tuesday, February 11, 2014
संगीत मेरी इबादत है:- ममता श्रीवास्तव
पाशर्व गायकी मे ममता श्रीवास्तव अब नया नाम नही है भोजपुरी और हिन्दी फिल्मों मे उनका खासा नाम है। पेशे से टीचर ममता श्रीवास्तव संगीत को एक ऐसे माध्यम के रूप में देखती है जिसके द्वारा वो इस समाज में कुछ योगदान दे सके। ममता मुंबई के आर वीटी विधालय मे बच्चो को संगीत सिकाती है। संस्कार उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि संगीत और सिनेमा समाज के अच्छे या बुरे बनने में बहुत असर डालतें हैै। उनके मुताबिक शिक्षिका होने के नाते वो गीतो एका चुनाव बेहद सजगता से करती है वो प्रसिद्व और पैसे के लिए कोई भी गाना नही गाती आकाशवाणी में वीहाई ग्रेड प्राप्त ममता श्रीवास्तव हाल ही में दिल्ली दूरदर्शन में एक शो के लिए आई डीडी 1 टीवी चैनल पर प्रसारित ईविनिंग लाइव शो में उन्होने इस्पेशल गेस्ट के तौर पर अपनी लिखी गजल और भोजपुरी लोगगीत गाये इसी मौके पर रउफ अहमद सिद्वीकी ने उनसे भोजपुरी गीतो और उनकी दिशा पर बात की प्रस्तुत है पूरी बात ।
आप मुख्यतः भोजपुरी गीत गाती है, जिसमें ज्यादा तर देवर भाभी और हल्के मूड के गाने होते है। गाने का चुनाव कैसे, करती हैः
मै हमेशा याद रखती हूॅ कि मै जो गाना गाउंगी उससे मेरे अपने बच्चे और स्टूडेटस जरूर सुनेंगे ऐसे में कलाकार के रूप में जिम्मेदारी है कि मै ऐसे गाऊ जिनसे समाज और बच्चो पर उसका बुरा प्रभाव न पडे इसके लिए चाहे मुझे साल मे 10 में से दो ही फिल्मो का चुनाव क्यू न करना पडे सफलता का रास्ता समझौते से नही पूरा करना चाहती इसके लिए मैने मडर 2 के एक गीत को ठुकरा दियाः- क्या बोल की वजह से ठुकराया आपने यह गाना --
नही डायरेक्टर ने मुझे इसमें गाने का खुद मौका दिया था लेकिन कुछ परिस्थ्यिों ऐसी बनी की मुझे नल करना पडा
संगीम में भोजपुरी गीतो का क्या योगदान है।---
बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है आपने पहले तो मै बताना चाहुगी की भोजपुरी आज वो पहले वाली भोजपुरी नही रह गयी है। जिसमें हर मौसम हर त्योहार और रस्म के लिए गीत होते थे आज भोजपुरी बस मैलोडी बनकर रह गयी है। फिर भी भोजपुरी गीतो को सुनने वाले पूरे देश में रहते है यहां तक कि मुबई में भी भोजपुरी के बहुत कद्रदान है संगीत और फिल्मो में भोजपुरी गीतो की अलग छाप है दीलीप साहब पर फिल्माया यह गाना नयन लड जयै तो कलेजवा में कसक हुइ बै करी, आज भी प्रसिद्व है इसके अलावा कई गीतो को लोग आज भी याद करते है
भोजपुरी में किस तरह के गीतो को पसन्द किया जाता है।
आज भोजपुरी फिल्मो में गीतो का माहौल बहुत बिगड गया है। भोजुपुरी गीत अशीललता और द्विअर्थी शब्दा से भरें पडे है आज फिल्म और संगीत निर्माता इन्हे जनता की डिमाड बताकर अपनी जेबे भरने में लगे है।लेकिन सच्चाई इसके एक दम विपरीत है जनता तो एक दम भेली होती है आप जो दिखाते है वह वो देखना उनकी मजबूरी है सिंगर भी यह नही ध्यान रखते की राईटर ने क्या लिखा है वो अश्लील से अश्लील गीत भी गाकर चल देते है उनको पैसे से संतुष्टि मिल जाती लेकिन मै संस्कृति से जुडी हूूॅ। मै कभी ऐसे गाने नही पसन्द करती जिन्हे बैठ कर अपने परिवार के साथ न देख सकूॅ।बच्चो पर आज के संगीत का क्या असर पड रहा है
कई बार मै हौरान रह जाती हॅ जब बच्चे मुझ से ऐसे गानो के विषय मे पूछते है जिसे सुनने के लिए वें बहुत छोटे है लेकिन वो गाने नेट और टीवी पर खुब दिख रहे है उनका पिक्चराइजेशन बेहद वल्गर है हम अपने बच्चो को उनकी पहुच से दूर नही रख सकते इसके लिए बस मै फिल्म और संगीत निर्माताओ से यही प्रार्थेना कर सकती हूॅ कि वो संस्कृति को भ्रष्ट करने वाली चीजे न दिखाये खाश तौर से भोजपुरी फिल्मों में इस बात का ध्यान रखने की सबसे अधिक आवश्यकता है।आप बाॅलीवुड में पहचान बना रही है ऐसे में संगीत और शिक्षिका की भूूिमका में कैस सामजस्य बैठाती है।
मुझसे बहुत लोगो ने कहा कि जब आप एक गाने का इतना अच्छा अमाउंन्ट लेती है तो क्यू स्कूल में नौकरी करती है दरअसल मुझे शिक्षिका के रूप में संतोष मिलता है जिस स्कूल में मै पढाती हूॅ वहा सस्कारो पर बल दिया जाता है यही वजह है कि मै यहां अपनी मिटट्ी से जुडा महसूस करती हूॅ साथ समाज के निर्माण में छोटा ही सही कुछ सार्थंक योगदान दे पाती हूॅसंगीत को लेकर आज काफी रियलिटी शो आ रहे है भोजपुरी में भी ऐसे मुकाबले आने लगे है आपको क्या लगता है कि ऐसे कार्यक्रम भोजपुरी संगीत के लिए कुछ योगदान दे पायेगे।
निरूसंदेह आज मोहल्ला काफी बदल रहा है कंपटीशन का दौर है रियल्टी शोज से एक मौका तो मिलता ही है लेकिन इस्ट्रगल कम नही हो सकता मै कहती हूॅ कि लता ताई के जमाने में बाॅलीबुड में स्ट्रगल करना आसान था लेकिन आज युग में अपनी पहचान इमानदारी से बना पाना बेहद कठिन है मैने एक बार लता जी के सामने स्टेज पर परफोम किया था उन्होने ने कहा था कि ममता आपकी आवाज बहुत अच्छी है मै तुमसे यही कहना चाहती हॅॅू जब भी गीत गाना अच्छे शब्दो और बोलो को देखकर ही गाना नही हो सके तो अपने दिल के आवाज को अपनी खुद की सीडी में उतारना मै आज भी उनकें दी सीख का पालन कर रही हॅॅू इसके लिए चाहे मुझे कितनी ही फिल्मो को छोडनी पडे।कुछ नौसीखिये डायरेक्टर आज भोजपुरी फिल्मो का निर्माण कर रहे है जिस के कारण फिल्मो का स्तर गिरया है और भोजपुरी सिनेमा का दुःशप्रचार हुआ है क्या आप इसे सही मानती है।।
बहुुत अच्छा सवाल है। बिल्कुल ठीक कहा आपने ब्लकि आपने मेरे दिल की बात पूछ ली है भोजपुरी में अच्छे डायरेक्टरों की कमी नही लेकिन आज भोजपुरी फिल्मो में कुछ नौसीखिये डायरेक्टर आ गए है मै एक फिल्मा का उदाहरण देना चाहुंगी डायरेक्टर का नाम नही लेना चाहूंगी फिल्म का नाम था प्रेम विरोधी नाम सुनकर लगेगा अच्छा विषय उठाया होगा डायरेक्टर ने इस फिल्म को मेरे भाई ने फाईनेंस किया था लेकिन स्टोरी उन्हे भी पता नही थी जब मै इसका गीत गाने स्टूडियों मे पहुंची तो वहा का माहौल और गीत के बोल देखकर मेरा मन उखड गया और मै विना गाये चली आई दूसरी ंिसगर ने हर लिमिटको को्रस करके वही गाना गाया और इसका फिल्मांकन बेहद वल्गर है मै ऐसे निर्माताओ से बस यही कहना चाहती हॅ कि भोजपुरी जो मिटट्ी है उसकी संस्कृति को गन्दा न करे।नई कौन सी पिक्चर आ रही है----
मेेरी एक फिल्म आ रही है शादी के सात दिन उसमें शादी से पूूर्व जो रस्मे होती है और जो लोकगीत गाये जाते उन्ही ण्को दिखाया गया है इसके अलावा फक्र मुंबई लाइव मे भी मैने गाने गाये है।Thursday, January 30, 2014
चाय और मिर्ज़ा जी
हम अपने पड़ोसी मिर्ज़ा जी से बड़े परेशान थे सूरज निकलना भूल सकता मगर वो सुबह सुबह अख़बार और
चाय और हमारी कुर्सी पर कब्जा करना नही भूलते थे हम से पहले हमारा अख़बार वो ही पढ़ते चाय का कप तो
हमारे हाथ में आने से पहले उनके हाथ में पहुच जाता था हमारी परेशानी हमारे पुराने नोकर मुन्नू खां शायद
समझ गये थे बोले -सिद्दीकी साहब अगर आप कहे तो ये परेशानी में दूर कर सकता हूँ -हम ने भी खुश होकर
हां कर दी -अगले दिन जेसे ही मिर्ज़ा जी ने आकर अख़बार पर कब्जा किया -मुस्कुराते हुए मुन्नू खां आ धमके - बोले मिर्ज़ा जी ठंडा लेंगे या गरम मिर्ज़ा जी ने रोब झाड़ते हुए कहा - गरम चाय -हुजुर कप में या गिलास में -
कप में -छोटे कप में या बड़े -
बड़े में
काली या दूध वाली
दूध वाली
मीठी या फीकी
मीठी
गर्म या ठंडी
गरम
हुज़ूर बिस्कुट
इतना सुन कर मिर्ज़ा जी आग भाबुला हो हए -भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी चाय -अख़बार मेज़ पर पटक
ऐसे गये की आज तीन दिन हो गये दिखाई नही दिए -मगर इन तीन दिनों में न मुझे अख़बार अच्छा लगा
न चाय और मेने फेसला किया अब में अख़बार और चाय बिना मिर्ज़ा जी के ,,,,,,,कभी नही
चाय और हमारी कुर्सी पर कब्जा करना नही भूलते थे हम से पहले हमारा अख़बार वो ही पढ़ते चाय का कप तो
हमारे हाथ में आने से पहले उनके हाथ में पहुच जाता था हमारी परेशानी हमारे पुराने नोकर मुन्नू खां शायद
समझ गये थे बोले -सिद्दीकी साहब अगर आप कहे तो ये परेशानी में दूर कर सकता हूँ -हम ने भी खुश होकर
हां कर दी -अगले दिन जेसे ही मिर्ज़ा जी ने आकर अख़बार पर कब्जा किया -मुस्कुराते हुए मुन्नू खां आ धमके - बोले मिर्ज़ा जी ठंडा लेंगे या गरम मिर्ज़ा जी ने रोब झाड़ते हुए कहा - गरम चाय -हुजुर कप में या गिलास में -
कप में -छोटे कप में या बड़े -
बड़े में
काली या दूध वाली
दूध वाली
मीठी या फीकी
मीठी
गर्म या ठंडी
गरम
हुज़ूर बिस्कुट
इतना सुन कर मिर्ज़ा जी आग भाबुला हो हए -भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी चाय -अख़बार मेज़ पर पटक
ऐसे गये की आज तीन दिन हो गये दिखाई नही दिए -मगर इन तीन दिनों में न मुझे अख़बार अच्छा लगा
न चाय और मेने फेसला किया अब में अख़बार और चाय बिना मिर्ज़ा जी के ,,,,,,,कभी नही
Monday, July 8, 2013
बारिश
नॉएडा में आज नाज़ुक नाज़ुक हल्की हल्की प्यारी प्यारी बूंदा बंदी उन खूबसूरत लम्हों की याद दिला गयी
जब हम हम यानि वोह और में आगन में भरे पानी में छापक छायया खेला करते थे एक दुसरे पर पानी
उछालते गारे के गोले एक दुसरे पर फेकने में कितना मज़ा आता था कागज़ की कश्ती बना कर पानी में
चलाना कितना मज़ा आता था मगर अब इस कंकरीट के जंगल में पैसा और शोहरत के पीछे इस तरह भाग
रहे हें की अपने लिए समय ही नही हे वोह कही हम कही बस यादे सिर्फ यादे सिर्फ यादे
जब हम हम यानि वोह और में आगन में भरे पानी में छापक छायया खेला करते थे एक दुसरे पर पानी
उछालते गारे के गोले एक दुसरे पर फेकने में कितना मज़ा आता था कागज़ की कश्ती बना कर पानी में
चलाना कितना मज़ा आता था मगर अब इस कंकरीट के जंगल में पैसा और शोहरत के पीछे इस तरह भाग
रहे हें की अपने लिए समय ही नही हे वोह कही हम कही बस यादे सिर्फ यादे सिर्फ यादे
Tuesday, May 14, 2013
बाबू जी लघु कथा
रोज रात को २ बजे बाबू जी जाग जाते थे और कभी कलमा पढ़ते कभी अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते कभी दुआ मांगते ये सिलसिला बरसों से चला आ रहा था वो जोर जोर से बोलते और मेरी नींद खुल जाती बहुत गुस्सा भी आता मगर कुछ कहने की हिम्मत नही होती थी फिर यही सुनते सुनते में सो जाता था .....मगर अब जब बाबू जी नही रहे मगर मेरी आँख अब भी रोज़ रात को २ बजे खुल जाती हे रात का सन्नाटा और ख़ामोशी चारो ओर होती हे मगर सुबह तक में सो नही पता
Sunday, May 12, 2013
लघु कथा
पिता जी के देहांत के बाद छोटे भाई के घर जाना हुआ उनकी बताई बातो का उनकी यादो का रात भर जिक्र होता रहा अगले दिन घर वापिस से पहले उस कमरे को देख कर जहाँ पिता जी रहते थे में बोला ...अब के कमरा खाली हो गया पिता जी तुम्हारी और तुम्हारे घर की चोकीदारी तो करते ही थे उनके होते कोई इस घर तो क्या गली में भी नही फटकता था ...भाई बोला ..नही भाई मेरे दोस्त ने एक जर्मन शेफर्ड डॉग गिफ्ट में दिया था जो अब बड़ा हो गया हे इस कमरे में वो ही रहेगा और यहाँ किसी को फटकने भी नही देगा में ये सुन कर सुन्न हो गया
Saturday, May 11, 2013
सियासत
सियासत से अदब की दोस्ती बेमेल लगती है
कभी देखा है पत्थर पे भी कोई बेल गलती है ?
ये सच है, हम भी कल तक जिन्दगी पर नाज़ करते थे
मगर अब जिन्दगी पटरी से उतरी रेल लगती है
गलत बाज़ार की जानिब चले आये हैं हम शायद
चलो, संसद में चलते वहाँ भी सेल लगती है कोई भी अंदरूनी गन्दगी बाहर नहीं होती
हमें तो इस हुकूमत की भी किडनी फेल लगाती है
कभी देखा है पत्थर पे भी कोई बेल गलती है ?
ये सच है, हम भी कल तक जिन्दगी पर नाज़ करते थे
मगर अब जिन्दगी पटरी से उतरी रेल लगती है
गलत बाज़ार की जानिब चले आये हैं हम शायद
चलो, संसद में चलते वहाँ भी सेल लगती है कोई भी अंदरूनी गन्दगी बाहर नहीं होती
हमें तो इस हुकूमत की भी किडनी फेल लगाती है
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